रायगढ़ में भू-अर्जन के बाद ‘रिकॉर्ड लापरवाही’ उजागर: कलेक्टर सख्त, 15 दिन में सुधार का अल्टीमेटम

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़, 2 जून 2026।
रायगढ़ जिले में वर्षों से चल रही औद्योगिक और आधारभूत परियोजनाओं के बीच एक गंभीर प्रशासनिक चूक सामने आई है। कोल माइंस, स्टील प्लांट, पावर प्लांट, रेल लाइन, नेशनल हाईवे, पाइपलाइन और सिंचाई परियोजनाओं के लिए हजारों एकड़ भूमि अधिग्रहित किए जाने के बावजूद राजस्व रिकॉर्ड आज तक अद्यतन नहीं किए गए हैं। इस लापरवाही ने न केवल राजस्व व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि संभावित गड़बड़ियों और विवादों की जमीन भी तैयार कर दी है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी ने इस पूरे मामले को प्राथमिकता में लेते हुए सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने सभी एसडीएम और तहसीलदारों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जिन भू-अर्जन प्रकरणों में अवार्ड पारित हो चुका है, उन सभी में भूमि अभिलेखों को तत्काल दुरुस्त किया जाए और निर्धारित प्रारूप में 15 दिनों के भीतर प्रमाण-पत्र प्रस्तुत किया जाए। इस प्रक्रिया की नियमित समीक्षा भी की जा रही है।
जानकारी के अनुसार, कई परियोजनाओं में जमीन अधिग्रहण के बाद भी संबंधित खसरा रिकॉर्ड में अब तक मूल भूमिस्वामी का नाम ही दर्ज है। इतना ही नहीं, अनेक मामलों में नक्शा तक नहीं काटा गया है, जबकि उन्हीं जमीनों पर प्लांट स्थापित हो चुके हैं, राष्ट्रीय राजमार्ग बन चुके हैं और रेल लाइनें संचालित हो रही हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाती है, बल्कि भविष्य में बड़े विवाद और भ्रष्टाचार की आशंका को भी जन्म देती है।
विशेष रूप से नेशनल हाईवे परियोजनाओं में इस तरह की गड़बड़ियां अधिक सामने आई हैं। कई गांवों में खेतों के बीच से सड़क गुजर जाने के बावजूद नक्शों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसी तरह केलो परियोजना की नहरों के लिए किए गए भू-अर्जन में भी रिकॉर्ड अद्यतन नहीं होने के मामले सामने आए हैं।
राजस्व रिकॉर्ड में इस तरह की खामियों के कारण पहले भी जिले में विवाद और कथित घोटाले सामने आ चुके हैं। ऐसे में कलेक्टर द्वारा शुरू किया गया यह ‘रिकॉर्ड सुधार अभियान’ प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
अब नजर इस बात पर है कि निर्धारित समयसीमा में संबंधित अधिकारी और कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए रिकॉर्ड को दुरुस्त कर पाते हैं या फिर यह आदेश भी कागजों तक ही सीमित रह जाता है। जिले में पारदर्शिता और सुशासन की कसौटी पर यह पहल कितनी खरी उतरती है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।
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