जनपद में जवाबदेही की परीक्षा: RTI के बाद हर फाइल पर उठे सवाल

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़/घरघोड़ा, 18 अगस्त 2026।
कागज़ों में दर्ज विकास और ज़मीन पर दिखने वाले काम के बीच का अंतर अक्सर सवालों के घेरे में रहता है। लेकिन इस बार सवाल सामान्य नहीं है—यह सीधे दस्तावेज़ों की मांग के साथ आया है। सूचना का अधिकार (RTI) की दो लगातार प्रथम अपीलों ने घरघोड़ा जनपद पंचायत की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। मामला अब जिला पंचायत के प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) तक पहुंच चुका है, जहां से स्पष्ट निर्देश जारी हुए हैं—रिकॉर्ड पेश करें, जवाब दें और नियमों का पालन करें।
एक हफ्ते में दो अपील—संयोग या संकेत?
घटनाक्रम ने प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। महज़ एक सप्ताह के भीतर दो अलग-अलग प्रथम अपीलें दाखिल होना इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं सूचना देने की प्रक्रिया में गंभीर चूक हुई है।
पहले मामले में सामुदायिक विकास निधि से जुड़े कार्यों की जानकारी मांगी गई थी। नियत समय पर संतोषजनक जानकारी नहीं मिलने पर मामला प्रथम अपील तक पहुंचा। 05 अगस्त 2026 को जिला पंचायत CEO ने आदेश जारी कर जनपद पंचायत के जनसूचना अधिकारी को निर्देशित किया कि उपलब्ध कराई जा सकने वाली समस्त जानकारी नियमानुसार दी जाए और उसका पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाए।
इसके बाद 10 अगस्त को दूसरा मामला सामने आया—इस बार दायरा और व्यापक था। तीन वर्षों (01 मार्च 2023 से 01 अप्रैल 2026) के भीतर CSR मद से हुए कार्यों का पूरा ब्यौरा मांगा गया।

RTI में क्या-क्या मांगा गया?
मांगी गई जानकारी साधारण नहीं है। यह सीधे उस तंत्र को परखती है, जिसके आधार पर विकास कार्यों का दावा किया जाता है—
– किन कंपनियों ने CSR के तहत कौन-कौन से कार्य स्वीकृत किए
– स्वीकृत राशि और कार्य की वर्तमान स्थिति
– प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति की प्रतियां
– कार्यादेश (वर्क ऑर्डर)
– उपयोगिता प्रमाण पत्र (UC)
– पूर्णता प्रमाण पत्र (Completion Certificate)
– भुगतान का पूरा विवरण—किसे, कब और कितना
– मापन पुस्तिका (MB) की प्रमाणित प्रतियां
ये वही दस्तावेज़ हैं जिन पर किसी भी विकास कार्य की वास्तविकता टिकी होती है। कागज़ सही हैं तो काम भी सही माना जाएगा, और यदि कागज़ों में गड़बड़ी है तो सवाल अपने आप खड़े हो जाएंगे।
प्रशासन पर सीधा दबाव—19 अगस्त की डेडलाइन
जिला पंचायत CEO ने दोनों मामलों में स्पष्ट समय-सीमा तय कर दी है। 19 अगस्त 2026 तक कार्रवाई कर पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। यह डेडलाइन अब सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा बन चुकी है।
RTI बनाम व्यवस्था—अब टकराव साफ दिख रहा है
यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या स्थानीय स्तर पर सूचना का अधिकार अधिनियम को गंभीरता से लिया जा रहा है?
RTI केवल जानकारी मांगने का माध्यम नहीं है, यह शासन-प्रशासन की पारदर्शिता का आधार है। जब जानकारी समय पर नहीं दी जाती, तो प्रथम अपील और उसके बाद की प्रक्रिया यह बताती है कि सिस्टम को मजबूर किया जा रहा है कि वह जवाबदेह बने।
यह मामला एक और पहलू को उजागर करता है—जब सूचना का अधिकार और सक्रिय पत्रकारिता साथ आती है, तो फाइलों में बंद जानकारी बाहर आने लगती है।
यह स्पष्ट होना जरूरी है कि RTI में जानकारी मांगे जाने या अपील होने से किसी भी प्रकार की अनियमितता स्वतः सिद्ध नहीं होती। लेकिन यह प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि—
जो किया गया है, उसका रिकॉर्ड सामने आए।
जो खर्च हुआ है, उसका हिसाब दिया जाए।
और जो दावा किया गया है, उसकी सच्चाई जांची जाए।
अब नजरें रिकॉर्ड पर—सवालों के जवाब मिलेंगे या और सवाल खड़े होंगे?
घरघोड़ा जनपद पंचायत में इस समय स्थिति यह है कि रिकॉर्ड रूम से लेकर जिम्मेदार अधिकारियों तक एक असहज चुप्पी और तेज़ गतिविधि दोनों साथ-साथ दिख रही हैं।
आने वाले दिनों में जब दस्तावेज़ सामने आएंगे, तब यह स्पष्ट होगा—
– विकास कार्य वास्तव में हुए या सिर्फ कागज़ों में दर्ज हैं
– भुगतान सही तरीके से हुआ या प्रक्रिया में कहीं चूक हुई
– और सबसे महत्वपूर्ण—क्या जनता के पैसे का उपयोग पारदर्शी तरीके से हुआ
RTI अधिनियम ने दस्तक दे दी है। अब जवाब देना व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
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