हरियाली का क्षरण, आपदा का विस्तार: उजड़ते वन और बढ़ते तापमान के बीच विश्व पर्यावरण दिवस की सख्त चेतावनी

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
5 जून, विशेष रिपोर्ट।
विश्व पर्यावरण दिवस इस वर्ष ऐसे समय में आ रहा है, जब प्रकृति के संतुलन पर सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है। एक ओर तेजी से घटते वन क्षेत्र हैं, तो दूसरी ओर अनियंत्रित तापमान वृद्धि और बाढ़ जैसी आपदाओं का बढ़ता दायरा—ये सब मिलकर संकेत दे रहे हैं कि विकास और विनाश के बीच की रेखा अब बेहद पतली हो चुकी है।
पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में जिस तेजी से जंगलों की कटाई हुई है, उसने पर्यावरणीय संतुलन को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि वे जलवायु को नियंत्रित करने, वर्षा चक्र को बनाए रखने और जैव विविधता को संरक्षित रखने की महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। जब ये कड़ी कमजोर होती है, तो उसका सीधा असर मौसम के मिजाज पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वनों की अंधाधुंध कटाई ने नदियों के स्वाभाविक प्रवाह और जलधारण क्षमता को भी प्रभावित किया है। यही कारण है कि अब हल्की बारिश भी कई क्षेत्रों में बाढ़ का रूप ले लेती है, जबकि कुछ इलाके सूखे की चपेट में आ जाते हैं। यह असंतुलन सीधे तौर पर मानव जीवन, कृषि और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है।
इसके समानांतर तापमान में हो रही लगातार वृद्धि भी चिंता का विषय बनी हुई है। शहरों में कंक्रीट का फैलाव और हरित क्षेत्र की कमी ने ‘हीट आइलैंड’ प्रभाव को बढ़ा दिया है, जिससे गर्मी के रिकॉर्ड टूट रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थिति अलग नहीं है, जहां जल स्रोत सूखने लगे हैं और खेती पर संकट गहराता जा रहा है।
पर्यावरण दिवस के अवसर पर यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या हम सिर्फ औपचारिकता निभा रहे हैं, या वास्तव में पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम उठा रहे हैं? वृक्षारोपण अभियानों की घोषणाएं और फोटो अवसरों से आगे बढ़कर अब स्थायी और प्रभावी नीतियों की आवश्यकता है।
नीतिगत स्तर पर सख्ती, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के बिना इस संकट से निपटना संभव नहीं है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी जिम्मेदारी मानना पर्याप्त नहीं होगा; इसमें आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है।
विश्व पर्यावरण दिवस एक अवसर है—सिर्फ जागरूकता का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का। यदि आज भी हमने चेतावनी के इन संकेतों को नजरअंदाज किया, तो आने वाले समय में प्राकृतिक आपदाएं और भी विकराल रूप ले सकती हैं।
अब सवाल यह नहीं कि पर्यावरण को बचाया जाए या नहीं, बल्कि यह है कि इसे बचाने के लिए हम कितनी गंभीरता और ईमानदारी से कदम उठाते हैं।

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