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धरमजयगढ़ में SECL परियोजना पर उबाल: ग्रामसभा के फैसले के आगे प्रबंधन बैकफुट पर, GM बोले—“बिना सहमति न सर्वे, न खदान” (देखें वीडियो)

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com

धरमजयगढ़/रायगढ़।
धरमजयगढ़ क्षेत्र एक बार फिर खनन परियोजना को लेकर उबल पड़ा है। अंबेटिकरा में प्रस्तावित दुर्गापुर-शाहपुर कोयला परियोजना के विरोध में ग्रामीणों ने ऐसा स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया कि स्वयं SECL के महाप्रबंधक (GM) को सार्वजनिक तौर पर यह कहना पड़ा—“अगर ग्रामीण नहीं चाहेंगे तो न ड्रोन सर्वे होगा और न ही खदान शुरू की जाएगी।”

SECL रायगढ़ के महाप्रबंधक अपनी टीम के साथ अंबेटिकरा पहुंचे थे। उद्देश्य था—प्रभावित किसानों, ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों से संवाद कर परियोजना को लेकर सहमति बनाना। लेकिन बैठक की शुरुआत से ही माहौल गर्म रहा। ग्रामीणों ने एक स्वर में साफ कर दिया कि वे अपनी जमीन किसी भी कीमत पर नहीं देंगे।

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ग्रामसभा के फैसले का हवाला, बार-बार सर्वे पर सवाल

ग्रामीणों ने अधिकारियों के सामने दस्तावेज़ी रूप से यह बात रखी कि संबंधित गांवों की ग्रामसभाओं में पहले ही प्रस्ताव पारित कर भूमि अधिग्रहण का विरोध दर्ज कराया जा चुका है। उनका कहना था कि जब ग्रामसभा स्पष्ट निर्णय दे चुकी है, तो बार-बार बैठक और ड्रोन सर्वे की कोशिशें आखिर किस आधार पर की जा रही हैं।

बैठक के दौरान कई बार स्थिति तनावपूर्ण भी हुई। ग्रामीणों ने यहां तक कह दिया कि अधिकारी क्षेत्र छोड़ दें और उन्हें बिना दबाव के जीवन जीने दिया जाए। ड्रोन सर्वे को लेकर भी लोगों में खासा आक्रोश देखने को मिला।

विरोध के बीच GM का बयान—परियोजना पर फिलहाल विराम के संकेत

लगातार विरोध और तीखे सवालों के बीच SECL के GM ने नरम रुख अपनाते हुए कहा कि कंपनी किसी भी तरह की कार्रवाई ग्रामीणों की इच्छा के विरुद्ध नहीं करेगी। उनका यह बयान न केवल मौके पर मौजूद लोगों के लिए महत्वपूर्ण था, बल्कि इससे यह संकेत भी मिला कि फिलहाल प्रबंधन टकराव से बचने की रणनीति अपना रहा है।

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राजनीतिक संकेत भी उभरे, मुख्यमंत्री से मुलाकात की तैयारी

बैठक में कुछ ग्रामीणों ने राजनीतिक संदर्भ भी उठाए। उन्होंने बताया कि क्षेत्र का एक बड़ा वर्ग वर्षों से सत्तारूढ़ दल का समर्थन करता आया है, लेकिन भूमि अधिग्रहण और सर्वे जैसे मुद्दों ने अब असंतोष पैदा कर दिया है।
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से मुलाकात कर अपनी आपत्ति और मांगों को सीधे रखने की तैयारी में है।

पांचवीं अनुसूची और PESA कानून बना मजबूत आधार

यह पूरा क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां आदिवासी स्वशासन और ग्रामसभा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। इसके साथ ही PESA Act 1996 लागू होने के कारण बिना ग्रामसभा की सहमति किसी भी प्रकार की भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया कानूनी विवाद का कारण बन सकती है।
इसके अलावा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 के प्रावधान भी यहां लागू होते हैं, जिनका पालन अनिवार्य है।

आगे की राह: टकराव या समाधान?

फिलहाल अंबेटिकरा और आसपास के गांवों में स्थिति स्पष्ट है—ग्रामीण अपने अधिकारों को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। दूसरी ओर, SECL प्रबंधन भी सीधे टकराव से बचते हुए संवाद का रास्ता तलाशता दिख रहा है।
अब नजर इस बात पर टिकी है कि आगामी दिनों में प्रशासन, कंपनी और ग्रामीणों के बीच सहमति का कोई रास्ता निकलता है या यह मुद्दा बड़े आंदोलन का रूप लेता है।

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Amar Chouhan

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