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“पहले पुनर्वास, फिर विकास”: बरौद में खदान विस्तार पर टकराव, ग्रामीणों ने बुनियादी ढांचे को छूने से रोका

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com

घरघोड़ा (रायगढ़)। रायगढ़ जिले के घरघोड़ा तहसील अंतर्गत ग्राम बरौद में प्रस्तावित खुली खदान परियोजना को लेकर अब हालात टकराव की स्थिति तक पहुंचते नजर आ रहे हैं। कोयला उत्पादन बढ़ाने की तैयारी में जुटे एसईसीएल प्रबंधन पर ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि वह बिना पूर्ण पुनर्वास सुनिश्चित किए ही गांव की मूलभूत सुविधाओं को हटाने की जल्दबाजी कर रहा है।

इसी मुद्दे को लेकर गांव में आक्रोश खुलकर सामने आया है। ग्राम पंचायत बरौद की हालिया ग्राम सभा में इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई, जहां प्रस्ताव क्रमांक 06 (दिनांक 17 अप्रैल 2026) के तहत सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि जब तक गांव का अंतिम व्यक्ति वर्तमान स्थान पर निवास कर रहा है, तब तक स्कूल, अस्पताल, पंचायत भवन सहित किसी भी शासकीय या सार्वजनिक संरचना को छेड़ा नहीं जाएगा।

ग्रामीणों का कहना है कि वे खदान परियोजना के विरोध में नहीं हैं, लेकिन विकास की आड़ में बुनियादी अधिकारों की अनदेखी स्वीकार्य नहीं है। उनका स्पष्ट तर्क है कि पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी किए बिना गांव के सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे को खत्म करना न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि अमानवीय भी है।

प्रशासन तक पहुंची आवाज

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए 25 मई 2026 को ग्रामीणों ने एक सामूहिक ज्ञापन जिला कलेक्टर और अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) घरघोड़ा को सौंपा। इस पत्र में उल्लेख किया गया है कि एसईसीएल प्रबंधन वर्तमान उत्पादन परियोजना का हवाला देते हुए गांव की आवश्यक संरचनाओं—जैसे प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक शाला, आंगनबाड़ी केंद्र, स्वास्थ्य केंद्र, पंचायत भवन, राजीव गांधी भवन, उचित मूल्य दुकान, सांस्कृतिक मंच, सड़कें और अन्य परिसंपत्तियों—को हटाने की प्रक्रिया शुरू करना चाहता है, जो कि नियमों और मानवीय दृष्टिकोण दोनों के विपरीत है।

“पहले बसाहट, फिर विस्थापन” की मांग

प्रभावित परिवारों का कहना है कि जब तक प्रत्येक परिवार का व्यवस्थित पुनर्वास सुनिश्चित नहीं हो जाता, तब तक बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं को समाप्त करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। ग्रामीणों ने विशेष रूप से बच्चों की शिक्षा और मरीजों के इलाज पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता जताई है।

उच्च स्तर पर भी उठाई गई बात

ग्रामीणों ने मामले को केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं रखा है। उन्होंने इस संबंध में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, खान सुरक्षा महानिदेशालय (धनबाद) सहित अन्य संबंधित विभागों को भी पत्राचार कर हस्तक्षेप की मांग की है, ताकि संभावित नुकसान को रोका जा सके।

गांव में बढ़ते असंतोष के बीच अब नजरें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विकास और विस्थापन के बीच संतुलन साधने की इस चुनौती में प्रशासन किस तरह समाधान निकालता है।

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Amar Chouhan

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