उरबा गांव में ‘अतिथि’ बना विवाद की वजह, 24 घंटे में तमनार पुलिस ने किया खुलासा

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़, 01 जून 2026।
तमनार थाना क्षेत्र के ग्राम उरबा में एक मामूली प्रतीत होने वाला विवाद इतनी भयावह परिणति तक पहुंच जाएगा, शायद किसी ने नहीं सोचा था। भोजन के बाद इस्तेमाल किए गए पत्तल को बाहर फेंकने की बात पर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते हिंसक झगड़े में बदल गया और एक 37 वर्षीय व्यक्ति की जान चली गई। तमनार पुलिस ने इस सनसनीखेज हत्या का महज 24 घंटे के भीतर खुलासा करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया है।
पुलिस के अनुसार, मृतक दामोदर राठिया ने घटना की रात गांव के कोटवार हरिराम चौहान को भोजन के लिए आमंत्रित किया था। भारतीय परंपरा में “अतिथि देवो भवः” की भावना को सर्वोपरि माना जाता है, लेकिन इसी आतिथ्य के बीच एक ऐसा विवाद जन्म ले बैठा जिसने एक परिवार को हमेशा के लिए उजाड़ दिया।
बताया जा रहा है कि भोजन के बाद पत्तल को बाहर फेंकने को लेकर दोनों के बीच कहासुनी शुरू हुई। यह मामूली सी बात जल्द ही आक्रामक बहस में बदली और फिर हिंसा में तब्दील हो गई। आरोप है कि हरिराम चौहान, उसका पुत्र आकाश चौहान और एक नाबालिग ने मिलकर लाठी-डंडे और चाकू से दामोदर राठिया पर हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल दामोदर को अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
घटना के प्रत्यक्षदर्शी और मृतक के बहनोई अवधराम राठिया ने पुलिस को बताया कि जब उन्होंने बीच-बचाव करने की कोशिश की तो उनके साथ भी मारपीट की गई।
तमनार पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए अपराध क्रमांक 122/2026 के तहत मामला दर्ज कर सभी आरोपियों को हिरासत में लिया। पूछताछ में आरोपियों ने अपराध स्वीकार किया, जिसके बाद उनकी निशानदेही पर घटना में प्रयुक्त डंडा और चाकू भी बरामद कर लिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम ने गांवों में आज भी मौजूद सामाजिक संवेदनशीलता और व्यवहारिक खाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह केवल एक सामान्य विवाद था या इसके पीछे कहीं न कहीं सामाजिक भेदभाव और अपमान की भावना भी जुड़ी हुई थी—यह जांच का विषय हो सकता है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि एक छोटे से व्यवहारिक असंतुलन ने जानलेवा रूप ले लिया।
यदि मेजबान अतिथि का सम्मान नहीं कर सकता था, तो उसे आमंत्रित ही नहीं करना चाहिए था। और यदि आमंत्रण दिया गया, तो भोजन के बाद पत्तल फेंकने जैसे निर्देश के बजाय सम्मानजनक व्यवहार अपेक्षित था। संभव है कि इसी कथित अपमान ने विवाद को भड़काया और अंततः एक निर्दोष की जान चली गई।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “क्षणिक आवेश में लिया गया हिंसक निर्णय न केवल एक जान ले लेता है, बल्कि पूरे परिवार को बर्बाद कर देता है। किसी भी विवाद का समाधान कानून और संवाद के माध्यम से ही होना चाहिए।”
इस मामले के त्वरित खुलासे में थाना प्रभारी प्रशांत राव सहित पुलिस टीम की अहम भूमिका रही।
उरबा की यह घटना सिर्फ एक हत्या का मामला नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाली एक त्रासदी भी है—जहां एक ‘पत्तल’ ने इंसानी रिश्तों की परतें खोल दीं और यह सवाल छोड़ दिया कि क्या हम आज भी छोटे-छोटे अहं और भेदभाव के कारण अपनी इंसानियत खोते जा रहे हैं।
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