‘सामुदायिक विकास निधि’ पर सख्ती: RTI के बाद घरघोड़ा जनपद में मची हलचल, 14 अगस्त तक पूरा हिसाब देने का निर्देश

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़।
जनपद पंचायत घरघोड़ा में ‘सामुदायिक विकास निधि’ के उपयोग को लेकर उठे सवाल अब प्रशासनिक स्तर पर गंभीर जांच का रूप लेते दिख रहे हैं। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई विस्तृत जानकारी ने न सिर्फ स्थानीय तंत्र को असहज किया, बल्कि जिला पंचायत स्तर तक हलचल पैदा कर दी है। मामले में प्रथम अपील पर सुनवाई करते हुए जिला पंचायत रायगढ़ के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) एवं अपीलीय अधिकारी अभिजीत पठारे ने स्पष्ट निर्देश जारी कर जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया तेज कर दी है।
क्या है मामला
घरघोड़ा निवासी शैलेश शर्मा ने 4 अगस्त 2026 को RTI आवेदन प्रस्तुत कर 1 मार्च 2024 से 31 मई 2026 के बीच ‘सामुदायिक विकास निधि’ के तहत स्वीकृत कार्यों और किए गए भुगतानों का विस्तृत ब्यौरा मांगा था।
निर्धारित समय-सीमा में संतोषजनक जानकारी उपलब्ध नहीं कराए जाने पर उन्होंने प्रथम अपील दायर की, जिसके बाद मामला जिला पंचायत तक पहुंचा।
RTI में उठाए गए मुख्य सवाल
आवेदन में निधि के उपयोग से जुड़े ऐसे बिंदु शामिल थे, जिनसे वित्तीय पारदर्शिता की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है—
भुगतान का पूरा विवरण: किन कार्यों पर कितना भुगतान हुआ, किसे किया गया और बैंक लेनदेन का रिकॉर्ड
बिल-वाउचर की प्रतियां: सामग्री खरीदी के सभी प्रमाणित दस्तावेज
ऑडिट रिपोर्ट: निधि के उपयोग की आधिकारिक जांच रिपोर्ट
बैठकों की कार्यवाही: प्रस्ताव, स्वीकृति और निर्णय से जुड़े रिकॉर्ड
जियो-टैग फोटो: कार्यों के वास्तविक क्रियान्वयन के प्रमाण
इन बिंदुओं पर जानकारी मांगना ही इस मामले को साधारण RTI से आगे ले जाकर एक संभावित वित्तीय जांच का आधार बना रहा है।
जिला पंचायत CEO का सख्त रुख
प्रथम अपील की सुनवाई के बाद CEO अभिजीत पठारे ने आदेश जारी कर जनपद पंचायत घरघोड़ा के जनसूचना अधिकारी को निर्देशित किया है कि—
आवेदक को आरटीआई के तहत उपलब्ध कराई जा सकने वाली समस्त जानकारी दी जाए
14 अगस्त 2026 से पहले की गई कार्यवाही का पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाए
साथ ही, अपीलार्थी को भी अपना पक्ष रखने का अवसर प्रदान किया गया है, जिससे प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे।
पारदर्शिता पर सवाल, जवाबदेही की परीक्षा
सामुदायिक विकास निधि का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर आधारभूत सुविधाओं का विकास करना है। लेकिन जब भुगतान, बिल-वाउचर और जियो-टैग जैसे मूल दस्तावेजों को साझा करने में देरी या अनिच्छा दिखाई जाती है, तो स्वाभाविक रूप से संदेह गहराता है।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि—
क्या कार्यों में फर्जी बिलिंग हुई?
क्या चयनित ठेकेदारों को प्राथमिकता दी गई?
क्या जियो-टैगिंग रिपोर्ट में वास्तविकता कुछ और दिखाती है?
अब निगाहें 14 अगस्त पर
निर्धारित समय-सीमा नजदीक आते ही प्रशासनिक हलकों में दबाव बढ़ता नजर आ रहा है। यदि समय पर जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती है, तो मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंच सकता है, जहां से दंडात्मक कार्रवाई की संभावना भी बनती है।
घरघोड़ा जनपद पंचायत का यह प्रकरण अब केवल सूचना देने या न देने का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही की एक बड़ी परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में उपलब्ध कराए जाने वाले दस्तावेज ही तय करेंगे कि विकास कार्यों का पैसा सही दिशा में खर्च हुआ या सवालों की गुंजाइश अभी बाकी है।
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