चक्रधर की परंपरा बनाम 41वां संस्करण: नाम बड़े, पर इस बार मंच पर क्यों नहीं दिखा वही जादू?

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़। चार दशक से अधिक समय से शहर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका चक्रधर समारोह इस वर्ष अपने 41वें संस्करण में एक ऐसे मोड़ पर खड़ा नजर आया, जहां परंपरा और अपेक्षाओं के बीच का अंतर साफ दिखाई दिया। महाराजा चक्रधर सिंह की स्मृति में आयोजित यह प्रतिष्ठित आयोजन हमेशा से शास्त्रीय संगीत, नृत्य और साहित्य के उत्कृष्ट संगम के रूप में जाना जाता रहा है। लेकिन इस बार का अनुभव कई समारोहप्रेमियों के लिए संतोषजनक नहीं रहा।
समारोह में कार्यक्रमों की कमी नहीं थी, मंच भी सजा और कलाकारों ने प्रस्तुतियां भी दीं, लेकिन जिस “जनआकर्षण” की पहचान चक्रधर समारोह की रही है, वह इस बार फीकी पड़ती दिखी। शहर में चर्चा का केंद्र एक ही सवाल रहा—क्या कलाकारों का चयन इस मंच की प्रतिष्ठा के अनुरूप था?
जब नाम ही बन जाते थे आयोजन की पहचान
चक्रधर समारोह का इतिहास गवाह है कि यहां मंच पर आने वाले कलाकार ही आयोजन का सबसे बड़ा आकर्षण हुआ करते थे। हेमा मालिनी की नृत्य प्रस्तुति हो या मीनाक्षी शेषाद्रि का भरतनाट्यम—इन नामों ने न केवल कला प्रेमियों को, बल्कि आम दर्शकों को भी कार्यक्रम स्थल तक खींचा।
इसी तरह शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में पंडित जसराज, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, उस्ताद अमजद अली खान और बेगम परवीन सुल्ताना जैसे दिग्गजों की मौजूदगी ने इस मंच को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
पुराने आयोजनों में कलाकारों की सूची ही इतनी प्रभावशाली होती थी कि कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही शहर में चर्चा का माहौल बन जाता था। इस बार वही “पूर्व उत्साह” कहीं कम नजर आया।
विविधता रही, पर आकर्षण कमजोर पड़ा
चक्रधर समारोह की एक बड़ी ताकत उसकी विविधता रही है। यहां गजल, कव्वाली, सूफी संगीत और लोकप्रिय गायन को भी मंच मिलता रहा है। कैलाश खेर जैसे कलाकारों की प्रस्तुति ने बीते वर्षों में यह साबित किया कि शास्त्रीयता और लोकप्रियता का संतुलन ही इस आयोजन की आत्मा है।
2024 और 2025 में कुमार विश्वास के कवि सम्मेलन ने हजारों लोगों को आकर्षित किया था। लेकिन इस वर्ष का कवि सम्मेलन उस स्तर का प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं रहा। पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा जैसे वरिष्ठ कवि की मौजूदगी के बावजूद कार्यक्रम में वह ऊर्जा और भीड़ नहीं दिखी, जिसकी परंपरा रही है।
कवि सम्मेलन: परंपरा का सबसे कमजोर कड़ी?
चक्रधर समारोह का कवि सम्मेलन हमेशा से “हाउसफुल” होने वाला कार्यक्रम माना जाता रहा है। आसपास के जिलों से भी लोग विशेष रूप से इस दिन पहुंचते थे। लेकिन 41वें आयोजन में यह परंपरा कमजोर पड़ती दिखी।
यहां सवाल कवियों की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि “संयोजन” और “विविधता” का है। क्या ऐसे नामों को मंच मिला, जिनकी घोषणा मात्र से लोगों में उत्साह पैदा होता? इस प्रश्न का उत्तर इस बार स्पष्ट रूप से सकारात्मक नहीं दिखता।
चूक कहां हुई—बजट या दृष्टिकोण?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह कमी आई कहां से?
क्या बजट सीमित था, जिससे बड़े कलाकारों को आमंत्रित नहीं किया जा सका?
या फिर चयन प्रक्रिया में प्राथमिकताएं बदलीं?
या आयोजन समिति ने इस बार “जनआकर्षण” की बजाय “औपचारिकता” पर अधिक जोर दिया?
इन सवालों के जवाब आधिकारिक रूप से सामने नहीं आए हैं, लेकिन दर्शकों की प्रतिक्रिया यह संकेत जरूर देती है कि कहीं न कहीं संतुलन बिगड़ा है।
कार्यक्रम हुए, लेकिन यादगार कितने?
हर वर्ष चक्रधर समारोह के बाद कुछ नाम लोगों की स्मृति में बस जाते थे। कभी किसी को किसी गायक की आवाज याद रहती थी, तो किसी को किसी नृत्यांगना की प्रस्तुति। लेकिन इस बार “याद रखने लायक नामों” की संख्या कम महसूस की गई।
हालांकि इस वर्ष भी पद्मश्री कविता कृष्णमूर्ति, भारती बंधु, अमित साना जैसे कलाकार मंच पर आए, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नाम उस स्तर का सामूहिक उत्साह पैदा कर पाए, जिसकी अपेक्षा इस मंच से की जाती है?
परंपरा निभाने से आगे बढ़ने की जरूरत
चक्रधर समारोह केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। ऐसे में केवल कार्यक्रमों की संख्या पूरी कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
जरूरी है कि:
शास्त्रीय कला के शीर्ष कलाकारों को मंच मिले
लोकप्रिय और जनप्रिय कलाकारों को भी शामिल किया जाए
कविता, गजल, सूफी और लोकधारा का संतुलित मिश्रण बने
यही संतुलन इस आयोजन को जीवंत बनाए रखता है।
अब पारदर्शिता और मंथन दोनों जरूरी
यदि बजट वास्तव में एक कारण रहा है, तो इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि नहीं, तो चयन प्रक्रिया पर पुनर्विचार जरूरी है। क्योंकि यह आयोजन केवल सरकारी खर्च नहीं, बल्कि सांस्कृतिक निवेश है।
अगले वर्ष के लिए संकेत
41वें चक्रधर समारोह ने एक स्पष्ट संदेश दिया है—परंपरा मजबूत है, लेकिन उसे बनाए रखने के लिए चयन में गंभीरता जरूरी है।
रायगढ़ का दर्शक आज भी उसी उत्साह से इंतजार करता है, जैसा वह पहले करता था। फर्क सिर्फ इतना है कि अब वह मंच पर “नाम” भी चाहता है, “स्तर” भी और “अनुभव” भी।
चार दशक की विरासत के बाद यह सवाल अब टल नहीं सकता—
क्या चक्रधर समारोह अपनी पुरानी चमक फिर हासिल कर पाएगा, या यह सिर्फ एक औपचारिक आयोजन बनकर रह जाएगा?
अन्य अधिक खबरों के लिए स्क्रॉल डाउन करें 👇⬇️