“संरक्षित वन में घुसपैठ, जुर्माना बन गया ढाल! NR इस्पात पर मेहरबानी या मिलीभगत? दबे फाइलों में दफन हुआ बड़ा वन अपराध”

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
तमनार/रायगढ़।
रायगढ़ जिले के तमनार वन परिक्षेत्र में संरक्षित वन भूमि पर कथित अवैध निर्माण का मामला अब महज़ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करने वाला प्रकरण बन चुका है। वन खण्ड क्रमांक 817 पी.एफ. में उद्योग समूह NR इस्पात द्वारा बिना वैधानिक अनुमति किए गए निर्माण कार्यों को लेकर जो कार्रवाई हुई, वह अब खुद संदेह के घेरे में है।
सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त दस्तावेज़ों, मौका पंचनामा और विभागीय प्रतिवेदन इस बात की पुष्टि करते हैं कि संरक्षित वन क्षेत्र में इंटेक वेल (जल संग्रहण संरचना) का निर्माण, पाइपलाइन बिछाने हेतु लगभग 60 मीटर लंबी खुदाई, तथा भूमिगत विद्युत केबल डालने जैसे कार्य बिना स्वीकृति के किए गए। इतना ही नहीं, लगभग 8×5 मीटर क्षेत्र में खुदाई और वृक्षों को क्षति पहुंचने के भी स्पष्ट संकेत दर्ज हैं।
मगर चौंकाने वाली बात यह है कि इतने गंभीर उल्लंघनों के बावजूद पूरा मामला महज़ एक मामूली जुर्माना वसूल कर “नस्तीबद्ध” कर दिया गया। यही वह बिंदु है, जहां से सवाल उठने शुरू होते हैं—क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर किसी बड़े संरक्षण का परिणाम?
पर्यावरण और वन कानून से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संरक्षित वन क्षेत्र में गैर-वन गतिविधियां पाई जाती हैं, तो यह केवल जुर्माने का विषय नहीं होता, बल्कि इसके लिए विस्तृत क्षति आकलन, दंडात्मक कार्रवाई और उच्च स्तरीय जांच आवश्यक होती है। ऐसे मामलों में प्रकरण को इस तरह बंद कर देना नियमों की आत्मा के विपरीत है।
स्थानीय सूत्रों और जानकारों का कहना है कि इस कार्रवाई में कई स्तरों पर “कलम की सफाई” दिखाई देती है। आरोप यह भी है कि पूरे प्रकरण को इस तरह निपटाया गया ताकि उद्योग प्रबंधन को कानूनी जटिलताओं से बचाया जा सके। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल खड़े करेगा, बल्कि वन संरक्षण कानूनों की विश्वसनीयता को भी गहरा आघात पहुंचाएगा।
अब इस मामले को लेकर उच्च स्तर पर शिकायत भेजने की तैयारी है। शिकायत में मांग की गई है कि:
– पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए,
– वन भूमि को हुई क्षति का पुनर्मूल्यांकन किया जाए,
– और यह भी जांचा जाए कि आखिर किन परिस्थितियों में इतना गंभीर मामला केवल जुर्माने में सिमट गया।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या कानून सबके लिए बराबर है, या फिर “समरथ को नहीं दोष गोसाई” की कहावत यहां भी चरितार्थ हो रही है?
यदि यह मामला फिर से खुलता है, तो न केवल NR इस्पात प्रबंधन बल्कि संबंधित अधिकारियों के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। फिलहाल, फाइलें भले बंद कर दी गई हों, लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा हैं—और जवाब की मांग कर रहे हैं।
Now U can Download Amar khabar from google play store also.