“ओवरटाइम किया, हक नहीं मिला: रायगढ़ आबकारी घोटाले में 7 करोड़ की गूंज, 150 कर्मचारियों की मेहनत पर ‘सिस्टम’ का डाका”

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़, 2 जून 2026।
रायगढ़ जिले में आबकारी विभाग से जुड़ा एक गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है, जिसने न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि मेहनतकश कर्मचारियों के अधिकारों को भी कठघरे में ला खड़ा किया है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार, जिले में शराब दुकानों पर कार्यरत करीब 150 कर्मचारियों के ओवरटाइम, बोनस और हॉलीडे-पे की राशि में लगभग 7 करोड़ रुपए के गबन की आशंका जताई जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक, यह पूरा मामला उस समय का है जब राज्य में शराब दुकानों के संचालन का जिम्मा छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (CSMCL) के माध्यम से निजी प्लेसमेंट कंपनियों को सौंपा गया था। ए टू जेड इंफ्रा सर्विसेज, प्राइम वन वर्कफोर्स प्रा. लि., सुमित फैसिलिटीज, अलर्ट कमांडोस और ईगल हंटर सॉल्यूशन जैसी कंपनियों को यह जिम्मेदारी दी गई थी। रायगढ़ जिले में मुख्यतः प्राइम वन वर्कफोर्स और ईगल हंटर के माध्यम से कर्मचारियों की नियुक्ति हुई।
कागजों में भुगतान, जमीन पर शून्य
जांच एजेंसियों, विशेषकर आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) की पड़ताल में यह तथ्य सामने आया है कि जिला आबकारी अधिकारियों द्वारा ओवरटाइम के फर्जी या बढ़े-चढ़े आंकड़े तैयार कर शासन को भेजे गए। शासन स्तर से पिछले तीन वर्षों में ओवरटाइम मद में लगभग 115 करोड़ रुपए जारी भी किए गए, लेकिन यह राशि कर्मचारियों तक नहीं पहुंची। आरोप है कि कंपनियों से यह रकम वापस लेकर उसे ऊपर तक ‘सिस्टमेटिक तरीके’ से बांटा गया।
हॉलीडे-पे और बोनस भी नहीं बचा
सिर्फ ओवरटाइम ही नहीं, बल्कि हॉलीडे-पे और बोनस में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई है। अक्टूबर 2019 से दिसंबर 2023 के बीच हॉलीडे-पे मद में लगभग 50 करोड़ रुपए जारी हुए, जिसमें रायगढ़ जिले का हिस्सा 1 से 2 करोड़ रुपए के बीच आंका जा रहा है। कर्मचारियों का दावा है कि उन्हें इन मदों में एक भी पैसा नहीं मिला।
“हमने काम किया, पैसा नहीं मिला” — कर्मचारियों की पीड़ा
पीड़ित कर्मचारियों की कहानी इस पूरे घोटाले का सबसे दर्दनाक पहलू है। एक सेल्समैन ने बताया कि उसे हर माह 12 हजार रुपए वेतन मिलता है, जबकि ओवरटाइम के रूप में करीब 8 हजार रुपए बनते थे। लेकिन वास्तविकता में उसे मात्र 4,753 रुपए भी नहीं मिले। इसी तरह सुपरवाइजर और मल्टी वर्कर के ओटी का भुगतान भी कागजों तक सीमित रहा।
प्रश्नों के घेरे में चयन प्रक्रिया
इस पूरे मामले में प्लेसमेंट कंपनियों के चयन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि प्रभावशाली व्यक्तियों से जुड़े होने के कारण कुछ कंपनियों को जानबूझकर प्राथमिकता दी गई। कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया में भी पारदर्शिता की कमी की शिकायतें सामने आई हैं।
जवाबदेही तय होना जरूरी
यह मामला केवल आर्थिक अनियमितता का नहीं, बल्कि श्रम के शोषण और प्रशासनिक जवाबदेही का भी है। जिन कर्मचारियों ने दिन-रात मेहनत की, त्योहारों और छुट्टियों में भी ड्यूटी निभाई, उन्हें उनका वैधानिक अधिकार नहीं मिलना गंभीर चिंता का विषय है।
अब नजरें जांच एजेंसियों और शासन पर टिकी हैं कि इस मामले में दोषियों की पहचान कर क्या सख्त कार्रवाई की जाती है, और क्या वर्षों से अपने हक के लिए भटक रहे कर्मचारियों को न्याय मिल पाता है या नहीं।
(यह मामला केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि उन 150 परिवारों की उम्मीदों का है, जिनकी मेहनत का मूल्य अब तक अधूरा है।)
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