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कोयले की रफ्तार बनी काल: सिंघनपुर में गर्भवती महिला की दर्दनाक मौत, सड़क पर उबल पड़ा गुस्सा

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़, 17 अप्रैल।
कोयलांचल के नाम से पहचाने जाने वाले रायगढ़ जिले में विकास की रफ्तार अब जानलेवा साबित होती दिख रही है। भूपदेवपुर थाना क्षेत्र के सिंघनपुर मार्ग पर शुक्रवार को जो हुआ, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर भारी वाहनों की बेलगाम रफ्तार पर लगाम कब लगेगी।

सुबह का वक्त, आम दिनों की तरह सड़क पर आवाजाही जारी थी। इसी बीच कोयला लोड एक तेज रफ्तार ट्रेलर ने सामने से आ रही स्कूटी को ऐसी टक्कर मारी कि सब कुछ पल भर में खत्म हो गया। स्कूटी सवार आंगनबाड़ी कार्यकर्ता उमा राठिया ट्रेलर के पहिए के नीचे आ गईं। टक्कर इतनी भयावह थी कि मौके पर ही उनकी मौत हो गई। बताया जा रहा है कि वह गर्भवती थीं—यह तथ्य इस हादसे को और भी अधिक हृदयविदारक बना देता है।

हादसे के वक्त स्कूटी पर उनके पति और बच्चा भी सवार थे। दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए, जिन्हें स्थानीय लोगों की मदद से तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया। घटना के बाद ट्रेलर चालक वाहन छोड़कर फरार हो गया, जिसकी तलाश में पुलिस जुटी है।

लेकिन इस बार मामला सिर्फ एक हादसे तक सीमित नहीं रहा। जैसे ही खबर गांव में फैली, लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। बड़ी संख्या में ग्रामीण सड़क पर उतर आए और चक्काजाम कर दिया। सिंघनपुर मार्ग पर लंबी कतारों में वाहन थम गए। आक्रोशित ग्रामीणों की मांग साफ थी—भारी वाहनों की गति पर सख्त नियंत्रण और पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा।

मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने हालात संभालने की कोशिश की, लेकिन ग्रामीणों का गुस्सा इस बात का संकेत था कि यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से पनप रहा आक्रोश है।

दरअसल, रायगढ़ का यह कोयलांचल क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में भारी वाहनों के दबाव से जूझ रहा है। कोयला परिवहन में लगे ट्रेलर दिन-रात सड़कों पर दौड़ते हैं—अक्सर बिना तय मानकों और सुरक्षा नियमों का पालन किए। नतीजा, आए दिन हादसे, धूल-प्रदूषण और स्थानीय लोगों की जिंदगी पर बढ़ता खतरा।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। लगभग हर सप्ताह किसी न किसी रूप में दुर्घटना की खबर सामने आती है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर ठोस और स्थायी समाधान अब तक नजर नहीं आता।

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या विकास की कीमत इंसानी जान हो सकती है? क्या कोयले की ढुलाई इतनी जरूरी है कि उसके आगे गांवों की सुरक्षा, बच्चों का भविष्य और आम लोगों की जिंदगी गौण हो जाए?

आज उमा राठिया इस लापरवाही की शिकार हुई हैं, कल कोई और होगा—यह आशंका अब लोगों के मन में स्थायी भय बन चुकी है। जरूरत इस बात की है कि शासन और प्रशासन इस चेतावनी को गंभीरता से लें। विकसित देशों की तरह सख्त यातायात नियम, अलग परिवहन कॉरिडोर और जिम्मेदार निगरानी व्यवस्था लागू किए बिना इस सिलसिले पर विराम लगना मुश्किल है।

फिलहाल सिंघनपुर की सड़क पर पसरा सन्नाटा और गुस्से से भरी भीड़ यही कह रही है—अब बहुत हो चुका।

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Amar Chouhan

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