“सांसों पर संकट: रायगढ़ की पर्यावरणीय सीमा पार, उद्योग विस्तार बना जनजीवन के लिए खतरे की घंटी”

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़। औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ अब रायगढ़ जिले की सांसों पर भारी पड़ती दिख रही है। कभी खनिज संपदा और औद्योगिक संभावनाओं के लिए पहचान रखने वाला यह जिला अब पर्यावरणीय धारण क्षमता (Environmental Carrying Capacity) की अंतिम सीमा तक पहुँच चुका है। हालात यह हैं कि विशेषज्ञ अब साफ तौर पर चेतावनी दे रहे हैं—“रायगढ़ में अब और उद्योगों का विस्तार, विकास नहीं बल्कि विनाश का संकेत होगा।”
जिले में इस समय 173 बड़े और मध्यम उद्योग संचालित हैं, जबकि 13 कोयला खदानों में लगातार खनन जारी है। इनमें SECL की 4, जिंदल समूह की 4, हिंडाल्को की 2 खदानों के अलावा NTPC, अंबुजा सीमेंट्स और सारडा एनर्जी की एक-एक खदान शामिल है। इसके अतिरिक्त अवैध खनन की भी लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, जो पर्यावरणीय दबाव को और बढ़ा रही हैं।
सबसे चिंताजनक स्थिति वायु प्रदूषण की है। नवंबर 2024 में PM2.5 का स्तर 317 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया गया—जो निर्धारित मानक 60 µg/m³ से पाँच गुना अधिक है। कई स्थानीय अध्ययनों में यह स्तर 2 से 30 गुना तक अधिक बताया गया है। पूंजीपथरा क्षेत्र को देश के सबसे प्रदूषित इलाकों में गिना जा चुका है।
जिले के प्रमुख उद्योग—जिंदल स्टील, JSPL, MSP और मोनेट स्टील—पहले से ही बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहे हैं, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण के प्रभावी उपायों की कमी लगातार सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि 173 उद्योगों में से अधिकांश में प्रदूषण नियंत्रण केवल कागजों तक सीमित है।
पर्यावरणीय संकट केवल हवा तक सीमित नहीं है। भू-जल स्तर तेजी से गिर रहा है—पेयजल अब 400 फीट से नीचे पहुंच चुका है। आरोप यह भी है कि कई उद्योग चोरी-छिपे भू-गर्भीय जल का दोहन कर रहे हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में पानी का संकट गहराता जा रहा है।
इसी बीच, स्थिति को और गंभीर बनाते हुए छह बड़े उद्योग—रायगढ़ इस्पात एंड पावर, सन स्टील, अडानी पावर, प्रिज्म स्टील, सिंघल इंटरप्राइजेज और रूंगटा प्राइवेट लिमिटेड—अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने की तैयारी में हैं। इन परियोजनाओं के लिए जनसुनवाई की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है, लेकिन स्थानीय विरोध लगातार तेज हो रहा है।
पर्यावरणविदों का स्पष्ट मत है कि रायगढ़ अब ‘संतृप्त औद्योगिक क्षेत्र’ (Saturated Industrial Zone) बन चुका है, जहाँ किसी भी नए विस्तार के लिए पर्यावरणीय क्षमता शून्य के बराबर है। इसके बावजूद यदि विस्तार को मंजूरी दी जाती है, तो यह सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होगा।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कोयला परिवहन से सड़कों पर धूल का गुबार स्थायी समस्या बन चुका है, खेत बंजर हो रहे हैं और सांस संबंधी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। “अब हालात ऐसे हैं कि साफ हवा भी एक विलासिता बन गई है,” एक ग्रामीण ने व्यथा व्यक्त करते हुए कहा।
रायगढ़ आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ विकास और विनाश के बीच की रेखा धुंधली हो चुकी है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन और नीति-निर्माता समय रहते चेतेंगे, या फिर उद्योगों का विस्तार इस जिले को एक स्थायी ‘गैस चैंबर’ में बदल देगा।
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