जल, जंगल, जमीन की पुकार: उड़ीसा से रायगढ़ तक आदिवासी अधिकारों पर तेज हुआ जन-जागरूकता अभियान

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़/भुवनेश्वर। देश के खनिज समृद्ध इलाकों में विकास बनाम विस्थापन की बहस एक बार फिर तेज होती दिख रही है। उड़ीसा के कालाहांडी और नियमगिरि से उठी आवाज अब छत्तीसगढ़ के रायगढ़ अंचल तक पहुंच रही है, जहां जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अधिकारों को लेकर जन-जागरूकता अभियान को व्यापक रूप देने की अपील की गई है। सामाजिक कार्यकर्ता ने इस मुद्दे पर एक विस्तृत संदेश जारी कर स्थानीय समुदायों, जनसंगठनों और नागरिक समाज से सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया है।
जारी संदेश में कहा गया है कि कालाहांडी और नियमगिरि जैसे क्षेत्र केवल प्राकृतिक संसाधनों का भंडार भर नहीं हैं, बल्कि वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों की आस्था, परंपरा, संस्कृति और जीवन-यापन का मूल आधार हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ के रायगढ़, तमनार और आसपास के वन क्षेत्र भी स्थानीय लोगों की पहचान और अस्तित्व से जुड़े हुए हैं। ऐसे में किसी भी विकास परियोजना को लागू करने से पहले स्थानीय समुदायों की सहमति, पर्यावरणीय संतुलन और संवैधानिक प्रावधानों का पालन सर्वोपरि होना चाहिए।

संदेश में विशेष रूप से बड़े औद्योगिक समूहों की गतिविधियों पर सवाल उठाए गए हैं। इसमें , , , के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के संदर्भ में , और जैसी कंपनियों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि खनन और औद्योगिक विस्तार के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव ने स्थानीय आबादी की आजीविका और पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर चुनौती दी है।
पद्मनाभ प्रधान ने अपने संदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि विकास का विरोध नहीं, बल्कि संतुलित और न्यायपूर्ण विकास की मांग की जा रही है। उनका कहना है कि ऐसी विकास नीति की आवश्यकता है जिसमें जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा सुनिश्चित हो, आदिवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकारों का सम्मान किया जाए और जैव विविधता को संरक्षित रखा जाए। उन्होंने यह भी जोर दिया कि ग्राम सभाओं की सहमति, वनाधिकार कानून और पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए।

अभियान में श्रमिक सुरक्षा को भी एक अहम मुद्दा बताया गया है। हाल के वर्षों में औद्योगिक परियोजनाओं से जुड़ी दुर्घटनाओं का हवाला देते हुए कहा गया है कि किसी भी हादसे की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। यदि जांच में लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित जिम्मेदार पक्षों पर सख्त कानूनी कार्रवाई अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। इससे न केवल श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि उद्योगों में जवाबदेही भी बढ़ेगी।
रायगढ़ अंचल के संदर्भ में संदेश में यह भी जोड़ा गया है कि यहां के जंगल, नदियां और खनिज संपदा लंबे समय से औद्योगिक गतिविधियों के दबाव में हैं। ऐसे में स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने क्षेत्र की प्राकृतिक धरोहर और सामाजिक संरचना की रक्षा के लिए सजग रहें।

अभियान के अंत में लोगों से अपील की गई है कि वे जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए एकजुट हों, आदिवासी अधिकारों का सम्मान करें और प्राकृतिक संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग की दिशा में आवाज उठाएं। साथ ही लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान भी किया गया है।

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