वर्दी के दुरुपयोग और यौन शोषण मामले में हाईकोर्ट का सख्त रुख : आरक्षक को अग्रिम जमानत से इनकार, “सहमति” की दलील खारिज

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
बिलासपुर/जशपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जशपुर जिले के कांसाबेल थाने में पदस्थ आरक्षक रुद्रमणि यादव की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि “वर्दी की संस्थागत शक्ति और कानूनी भय के बीच बनी रजामंदी को स्वतंत्र सहमति नहीं माना जा सकता।” अदालत के इस रुख के बाद यह मामला एक बार फिर गंभीर चर्चा में आ गया है।
यह प्रकरण एक आदिवासी विधवा महिला से जुड़े कथित यौन शोषण, जबरन गर्भपात, ब्लैकमेलिंग और आर्थिक धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोपों से संबंधित है, जिसकी सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ में हुई।
सोशल मीडिया से शुरू हुई जान-पहचान, गंभीर आरोपों तक पहुँचा मामला
अभियोजन और पीड़िता के पक्ष के अनुसार, यह मामला वर्ष 2023 से जुड़ा है, जब आरोपी आरक्षक की पहचान पीड़िता से सोशल मीडिया के माध्यम से हुई। प्रारंभिक बातचीत के बाद दोनों के बीच संपर्क बढ़ा, जिसके बाद आरोपी द्वारा वर्दी और पद के प्रभाव का उपयोग कर संबंध बनाए जाने के आरोप लगाए गए हैं।
आरोप है कि इस दौरान महिला के साथ लगातार शारीरिक संबंध बनाए गए और बाद में गर्भवती होने पर उसे दबाव में लेकर गर्भपात कराया गया।
ब्लैकमेलिंग और आर्थिक लेन-देन के गंभीर आरोप
मामले में यह भी आरोप है कि विवाद बढ़ने के बाद स्थिति और गंभीर हो गई। पीड़िता के अनुसार—
उसकी निजी तस्वीरों को वायरल करने की धमकी और प्रसार किया गया
सामाजिक रूप से बदनाम करने की कोशिश की गई
जमीन दिलाने के नाम पर लगभग ₹2 लाख की राशि ली गई
इन आरोपों के चलते पीड़िता लंबे समय तक शिकायत दर्ज कराने से बचती रही, जिसका कारण वर्दीधारी आरोपी का प्रभाव और कथित दबाव बताया गया है।
हाईकोर्ट में बचाव पक्ष की दलीलें और राज्य का विरोध
अग्रिम जमानत याचिका में आरोपी पक्ष ने दलील दी कि दोनों बालिग हैं और संबंध आपसी सहमति से बने थे। साथ ही यह भी कहा गया कि शिकायत दर्ज कराने में लंबा समय लिया गया, इसलिए मामला संदिग्ध प्रतीत होता है।
हालांकि राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत पक्ष में कहा गया कि—
पीड़िता एक आदिवासी विधवा महिला है
आरोपी पुलिस विभाग में पदस्थ होकर संस्थागत शक्ति का उपयोग कर रहा था
सामाजिक और प्रशासनिक दबाव के कारण शिकायत में देरी स्वाभाविक है
“संस्थागत शक्ति के दबाव में सहमति नहीं मानी जा सकती” : कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस या किसी भी शासकीय पद पर कार्यरत व्यक्ति के पास राज्य की शक्ति होती है। ऐसे में यदि कोई पीड़ित व्यक्ति भय, दबाव या सामाजिक असहजता के कारण संबंधों में रहता है, तो उसे स्वतंत्र सहमति नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने प्रथम दृष्टया आरोपों की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को अग्रिम राहत देने से इनकार कर दिया।
फैसले के बाद जांच एजेंसियों पर बढ़ा दबाव
हाईकोर्ट के इस निर्णय के बाद अब संबंधित पुलिस और जांच एजेंसियों पर आरोपी आरक्षक की गिरफ्तारी की प्रक्रिया तेज करने का दबाव बढ़ गया है। मामला संवेदनशील प्रकृति का होने के कारण प्रशासनिक स्तर पर भी निगरानी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण मामला
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला इस बात को रेखांकित करता है कि जब आरोपी किसी संवैधानिक या पुलिस पद पर हो, तो उसके प्रभाव और शक्ति का दुरुपयोग सहमति की परिभाषा को प्रभावित कर सकता है। कोर्ट की टिप्पणी आने वाले समय में ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है।
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