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पेलमा में फिर ‘कोयले’ की दस्तक: 2000 हेक्टेयर में प्रस्तावित खदान, 1350 परिवारों पर असर—21 मई को जनसुनवाई

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़, तमनार।
कोयलांचल रायगढ़ के तमनार क्षेत्र में एक बार फिर खनन परियोजना को लेकर हलचल तेज हो गई है। पेलमा और आसपास के गांवों में प्रस्तावित नई ओपनकास्ट कोयला खदान के लिए आगामी 21 मई 2026 को अटल चौक, पेलमा में जनसुनवाई आयोजित की जा रही है। जैसे-जैसे तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे इलाके में चर्चा और चिंता दोनों गहराने लगी है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह प्रस्तावित खदान लगभग 2000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली होगी, जिसमें करीब 250 हेक्टेयर वन भूमि भी प्रभावित होने की आशंका है। सबसे बड़ा असर उन 1350 परिवारों पर पड़ने वाला है, जिनका जीवन-यापन सीधे तौर पर इस जमीन, जंगल और स्थानीय संसाधनों से जुड़ा हुआ है।

परियोजना से जुड़े दस्तावेजों के मुताबिक, यह खदान तमनार तहसील के पेलमा, उरबा, मदुआडूमर, लालपुर, हिंझर, जरहीडीह, सक्ता, मिलुपारा और खार्रा जैसे गांवों के आसपास विकसित की जानी है। ऐसे में इसका दायरा सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे इलाके की सामाजिक और पर्यावरणीय संरचना को प्रभावित करने वाला है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र पहले से ही कोयला परिवहन, प्रदूषण और औद्योगिक गतिविधियों के दबाव में है। लगातार बढ़ते ट्रेलर, उड़ती धूल और बिगड़ते स्वास्थ्य के बीच अब एक और खदान का प्रस्ताव उन्हें असहज कर रहा है। ग्रामीणों को आशंका है कि खेती की जमीन, जलस्रोत और जंगलों पर इसका सीधा असर पड़ेगा, जिससे उनकी आजीविका संकट में आ सकती है।

दूसरी ओर, प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत जनसुनवाई को परियोजना के लिए जरूरी औपचारिक कदम बताया जा रहा है, जहां प्रभावित लोग अपनी आपत्तियां, सुझाव और विचार रख सकते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह भी है कि ऐसे मंचों पर उठी आवाजें कितनी प्रभावी होती हैं, इस पर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं।

पर्यावरणविदों का मानना है कि 250 हेक्टेयर वन भूमि का प्रभावित होना केवल पेड़ों की कटाई भर नहीं है, बल्कि इससे जैव विविधता, वन्यजीवों के आवास और पूरे पारिस्थितिक संतुलन पर असर पड़ेगा। वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि विस्थापन केवल घर बदलने का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरी जीवनशैली और सांस्कृतिक पहचान के टूटने का खतरा भी साथ लाता है।

अब निगाहें 21 मई की जनसुनवाई पर टिकी हैं, जहां एक ओर परियोजना के पक्ष में विकास और रोजगार के तर्क रखे जाएंगे, तो दूसरी ओर स्थानीय लोग अपने अस्तित्व, जमीन और पर्यावरण को बचाने की आवाज बुलंद करेंगे।

तमनार का यह इलाका पहले ही खनन और उद्योगों की कीमत चुका रहा है। ऐसे में यह जनसुनवाई सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस सवाल का जवाब भी तलाशेगी—क्या विकास और विनाश के बीच कोई संतुलन संभव है, या फिर एक बार फिर ‘कोयले’ का पलड़ा ही भारी पड़ेगा?

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Amar Chouhan

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