रायगढ़ डाकघर पर भरोसे को झटका: 83 वर्षीय बुजुर्ग की लाखों की जमा पूंजी गायब, जवाब देने से बच रहा प्रशासन

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़, 26 जून 2026।
डाकघर जैसी पारंपरिक और भरोसेमंद मानी जाने वाली संस्था पर एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। शहर के सोनार पारा निवासी 83 वर्षीय सेवानिवृत्त अधिकारी बसंत कुमार सोनार की जीवनभर की कमाई आज अनिश्चितता के भंवर में फंसी नजर आ रही है। आरोप है कि डाकघर में जमा उनकी लाखों रुपये की राशि का कोई स्पष्ट हिसाब नहीं मिल पा रहा, और संबंधित अधिकारी जवाब देने से बचते दिखाई दे रहे हैं।
बसंत सोनार, जो भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) से वर्ष 1999 में सीनियर मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हुए थे, ने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद की जमा पूंजी को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से रायगढ़ मुख्य डाकघर में निवेश किया था। उन्होंने 13 मंथली इनकम स्कीम (MIS) खाते और 3 सीनियर सिटीजन सेविंग्स अकाउंट खुलवाए थे। इन खातों से उन्हें नियमित ब्याज प्राप्त होता रहा, जिससे उनका जीवनयापन सुचारू रूप से चलता रहा।
मामला तब उलझा जब खातों की मैच्योरिटी के वर्षों बाद उन्होंने अपनी मूल राशि वापस लेने की कोशिश की। बुजुर्ग के अनुसार, जब वे राशि निकालने पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि उनके खातों में मूलधन का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। खातों के अंतिम पृष्ठों में केवल बैलेंस दर्ज कर खाते बंद कर दिए गए हैं, जबकि भुगतान से संबंधित कोई ठोस प्रविष्टि नहीं है।
स्थिति को और संदिग्ध बनाता है डाकघर प्रशासन का रवैया। शिकायत के बावजूद न तो संतोषजनक जवाब मिला और न ही दस्तावेजों में स्पष्टता दिखाई दी। लोक अदालत में दायर आवेदन की सुनवाई के दौरान भी डाक विभाग के जिम्मेदार अधिकारी अनुपस्थित रहे। 9 अप्रैल 2026 को भेजे गए एक पत्र में न तो दिनांक अंकित था और न ही आधिकारिक सील—जो प्रशासनिक लापरवाही या जानबूझकर टालमटोल की ओर इशारा करता है।
डाकघर प्रबंधन का दावा है कि खाताधारक ने स्वयं राशि निकालकर नए खातों में निवेश किया, लेकिन इस दावे के समर्थन में कोई ठोस रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया है। यही नहीं, संबंधित खातों में ऐसी किसी भी लेन-देन की प्रविष्टि नहीं मिलती, जिससे संदेह और गहरा हो गया है।
सूत्रों की मानें तो यह मामला महज लापरवाही नहीं बल्कि संभावित गबन का रूप ले सकता है। उदाहरण के तौर पर एक खाते में लगभग 4.52 लाख रुपये की राशि दर्ज होने के बावजूद उसका भुगतान नहीं किया गया। इसी प्रकार अन्य खातों में भी अनियमितताएं सामने आ रही हैं।
जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े बसंत सोनार अब अपनी ही जमा पूंजी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। यह घटना न केवल एक व्यक्ति के साथ अन्याय का मामला है, बल्कि उस विश्वास को भी गहरी चोट पहुंचाती है, जिसके आधार पर लाखों लोग आज भी डाकघर में अपनी पूंजी सुरक्षित मानते हैं।
इस पूरे प्रकरण में अब आवश्यकता है कि उच्च स्तर पर निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, ताकि न केवल पीड़ित को न्याय मिल सके, बल्कि आम जनता का भरोसा भी बहाल किया जा सके।
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