नल-जल योजना: लक्ष्य बढ़ा, ज़मीन पर सवाल बरकरार—रायगढ़ में अधूरे टैंक और अधूरी प्यास

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़।
ग्रामीण भारत के हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के उद्देश्य से 15 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू किया गया जल जीवन मिशन आज भी कई इलाकों में अधूरी तस्वीर पेश कर रहा है। कागज़ों पर लक्ष्य तय हुए, समय-सीमा बदली गई, बजट बढ़ा—लेकिन जमीनी हकीकत अब भी कई सवाल खड़े कर रही है, खासकर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में।
योजना का मूल लक्ष्य वर्ष 2024 तक हर ग्रामीण घर में नल कनेक्शन के जरिए शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना था। बाद में इसे बढ़ाकर 2028 तक कर दिया गया, ताकि छूटे हुए घरों को भी शामिल किया जा सके। लेकिन रायगढ़ के कई गांवों में नल-जल योजना की प्रगति अपेक्षा के अनुरूप नहीं दिखती।
स्थानीय नागरिक पद्मनाभ प्रधान का कहना है कि “योजना की घोषणा को कई साल हो गए, लेकिन जिले के सभी गांवों तक सुविधा पहुंचने का दावा अभी वास्तविकता से दूर लगता है।” उनका आरोप है कि कई जगहों पर पानी टंकियों का निर्माण तो किया गया, लेकिन वे पूरी तरह क्रियाशील नहीं हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में बने जल टंकियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। वर्ष 2024-25 में जिन टंकियों के निर्माण और संचालन की उम्मीद थी, वे अब तक पूरी तरह चालू नहीं हो पाई हैं। कई स्थानों पर ‘कम्पलीट टंकी सेटिंग’ का काम लंबित है, जिससे पानी की आपूर्ति बाधित हो रही है। स्थानीय लोगों के बीच निर्माण की गुणवत्ता को लेकर भी संदेह है—क्या इन टंकियों का निर्माण तय मानकों के अनुरूप हुआ है या नहीं, यह एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है।
जमीनी स्तर पर देखने पर यह भी सामने आता है कि पाइपलाइन बिछाने के बाद भी कई घरों में नियमित जल आपूर्ति शुरू नहीं हो पाई है। कहीं मोटर चालू नहीं होती, तो कहीं पाइपलाइन में ही तकनीकी खामियां बताई जा रही हैं। इससे योजना के क्रियान्वयन पर निगरानी और जवाबदेही को लेकर बहस तेज हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की महत्वाकांक्षी योजनाओं में केवल निर्माण कार्य पूरा करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसकी सतत निगरानी, गुणवत्ता नियंत्रण और समयबद्ध संचालन भी उतना ही जरूरी है। यदि इन पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया, तो योजना का मूल उद्देश्य—हर घर तक स्वच्छ जल—सिर्फ लक्ष्य बनकर रह जाएगा।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित विभाग और प्रशासन इन शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्या अधूरी परियोजनाएं समय पर पूरी होंगी? क्या ग्रामीणों को नियमित और शुद्ध पानी मिल पाएगा?
रायगढ़ के गांवों में इन सवालों के जवाब अभी भी ‘आने वाले समय’ पर टाले जा रहे हैं, जबकि प्यास आज भी उतनी ही वास्तविक है।
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