तमनार-घरघोड़ा-धरमजयगढ़ क्षेत्र में पांच नए कोल ब्लॉकों की नीलामी की तैयारी, लगभग 50 वर्ग किमी क्षेत्र प्रभावित होने की आशंका

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़।कोयला मंत्रालय द्वारा जारी नई कोल ब्लॉक नीलामी सूची में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले को एक बार फिर प्रमुख स्थान मिला है। सीएमएसपी एक्ट के तहत 26वें और एमएमडीआर एक्ट के 16वें राउंड की इस नीलामी प्रक्रिया में देशभर के कुल 25 कोल ब्लॉक्स शामिल किए गए हैं, जिनमें से पांच अकेले रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़, घरघोड़ा और तमनार क्षेत्र में स्थित हैं।
इन ब्लॉकों की नीलामी प्रक्रिया को लेकर जहां केंद्र सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा और कोयला उत्पादन बढ़ाने की दिशा में एक कदम बता रही है, वहीं स्थानीय स्तर पर इसे लेकर पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामीण जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता गहराती जा रही है।
रायगढ़ पर विशेष फोकस, पांचों खदानें एक ही जिले से
सूची के अनुसार छत्तीसगढ़ से कुल पांच कोल ब्लॉक शामिल किए गए हैं और दिलचस्प बात यह है कि ये सभी रायगढ़ जिले में ही स्थित हैं। इनमें झारपालम टांगरघाट, कारीछापर वेस्ट, नवागांव ईस्ट, नवागांव वेस्ट और बायसी कोल ब्लॉक शामिल हैं।
इनमें से कुछ ब्लॉक पहले भी नीलामी प्रक्रिया में आ चुके हैं, जबकि एक ब्लॉक को दूसरी बार नीलामी सूची में शामिल किया गया है। यह दर्शाता है कि इन क्षेत्रों में खनन परियोजनाओं को लेकर लगातार रुचि बनी हुई है।
लगभग 50 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर असर की आशंका
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इन पांचों कोल ब्लॉकों का कुल क्षेत्रफल लगभग 50 वर्ग किलोमीटर के आसपास है। विशेषज्ञों और स्थानीय स्तर पर सामने आ रही चर्चाओं के अनुसार यदि इन खदानों का विकास शुरू होता है तो इसका सीधा असर कृषि भूमि, वन क्षेत्र और ग्रामीण बस्तियों पर पड़ सकता है।
इन ब्लॉकों में झारपालम टांगरघाट (11.64 वर्ग किमी), बायसी (5.39 वर्ग किमी), नवागांव ईस्ट (14.06 वर्ग किमी), नवागांव वेस्ट (9.42 वर्ग किमी) और कारीछापर वेस्ट (7.86 वर्ग किमी) शामिल हैं।
धरमजयगढ़, घरघोड़ा और तमनार जैसे संवेदनशील वन एवं खनन प्रभावित क्षेत्रों में इन परियोजनाओं को लेकर पहले से ही ग्रामीण विरोध और असंतोष की स्थिति समय-समय पर सामने आती रही है।
जंगल, कृषि भूमि और आजीविका पर प्रभाव की चिंता
स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के अनुसार इन क्षेत्रों में पहले से ही कोयला खनन का व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। नई खदानों के जुड़ने से वन आवरण में और कमी, भू-जल स्तर पर दबाव तथा कृषि योग्य भूमि में गिरावट की आशंका जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियों के कारण न केवल पेड़ों की कटाई बढ़ती है, बल्कि आसपास के जल स्रोत भी प्रभावित होते हैं। इसके अलावा धूल और प्रदूषण के स्तर में वृद्धि से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ने की आशंका रहती है।
कैरिंग कैपेसिटी पर बड़ा सवाल
पर्यावरणीय दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण सवाल इन क्षेत्रों की ‘कैरिंग कैपेसिटी’ यानी वह क्षमता है जिसके भीतर कोई क्षेत्र विकास और प्राकृतिक संतुलन दोनों को संभाल सकता है।
धरमजयगढ़ और तमनार क्षेत्र पहले से ही कई खनन परियोजनाओं, कोल वाशरी और परिवहन दबाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि नए ब्लॉकों के जुड़ने से क्षेत्र की पर्यावरणीय क्षमता पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
खनन गतिविधियों के बढ़ने से ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क पर दबाव, भारी वाहनों की आवाजाही, सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम और वायु गुणवत्ता में गिरावट जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।
विकास बनाम विस्थापन की बहस फिर तेज
सरकार जहां इन परियोजनाओं को ऊर्जा उत्पादन और औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक मान रही है, वहीं स्थानीय स्तर पर इसे विस्थापन, वन विनाश और जीवनशैली पर खतरे के रूप में देखा जा रहा है।
ग्रामीणों की चिंता यह भी है कि खनन विस्तार के साथ रोजगार के सीमित अवसर तो मिलते हैं, लेकिन इसके मुकाबले जमीन, जंगल और पानी जैसी मूलभूत संसाधनों पर दीर्घकालिक असर कहीं अधिक होता है।
10 नवंबर को टेक्निकल बिड, दिसंबर में ई-ऑक्शन
कोयला मंत्रालय की प्रक्रिया के अनुसार इन ब्लॉकों के लिए 10 नवंबर 2026 को तकनीकी बिड खोली जाएगी, जबकि 3 से 10 दिसंबर के बीच इलेक्ट्रॉनिक नीलामी (ई-ऑक्शन) की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
इसके बाद ही यह तय होगा कि कौन सी कंपनियां इन ब्लॉकों के विकास का अधिकार प्राप्त करती हैं और आगे जमीन अधिग्रहण एवं परियोजना विकास की प्रक्रिया किस गति से आगे बढ़ती है।
संतुलन की चुनौती
रायगढ़ जिले के लिए यह स्थिति एक बार फिर विकास और पर्यावरणीय संतुलन के बीच खड़े कठिन सवालों को सामने लाती है। एक ओर ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का दबाव है, तो दूसरी ओर जंगल, जमीन और जल संसाधनों के संरक्षण की चुनौती।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन परियोजनाओं में स्थानीय हित, पर्यावरणीय सुरक्षा और औद्योगिक विकास के बीच किस तरह संतुलन स्थापित किया जाता है।
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