करोड़ों का राजस्व, जर्जर सरकारी छतें: घरघोड़ा में बारिश ने खोल दी व्यवस्था की पोल

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
तहसील से लेकर विभागीय कार्यालयों और कर्मचारी आवासों तक बदहाल भवनों की शिकायतें; कहीं छत टपक रही तो कहीं तिरपाल के सहारे गुजर रहा बरसात का मौसम
घरघोड़ा।
रायगढ़ जिला अपनी खनिज संपदा और औद्योगिक गतिविधियों के कारण प्रदेश के महत्वपूर्ण राजस्व जिलों में गिना जाता है। जिले के औद्योगिक और खनन क्षेत्रों से सरकार को बड़ी मात्रा में राजस्व प्राप्त होता है। विकास और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर भी करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। लेकिन इसी जिले के घरघोड़ा में सरकारी भवनों और कर्मचारी आवासों की स्थिति पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।
मानसून के सक्रिय होते ही घरघोड़ा के कई शासकीय भवनों और विभागीय आवासों की हालत एक बार फिर चर्चा में है। कर्मचारियों की ओर से भवनों की मरम्मत, छतों से पानी रिसने, दीवारों में सीलन और पुराने भवनों की खराब स्थिति को लेकर परेशानी जताई जा रही है। स्थिति यह है कि बारिश के दौरान कुछ कार्यालयों में कर्मचारियों को दस्तावेज और जरूरी सामान सुरक्षित रखने की अतिरिक्त चिंता करनी पड़ती है।

बारिश शुरू होते ही बदल जाती है कार्यालय की प्राथमिकता
तहसील कार्यालय, कृषि विभाग, ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (आरईएस), जल संसाधन विभाग, शिक्षा विभाग, पुलिस विभाग और वन विभाग सहित विभिन्न सरकारी संस्थानों के भवनों का इस्तेमाल प्रतिदिन प्रशासनिक कामकाज के लिए होता है। इन कार्यालयों में आम लोगों से जुड़े राजस्व, प्रमाण-पत्र, विकास कार्य, शिक्षा, सिंचाई, वन और कानून-व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण कार्य संचालित होते हैं।
ऐसे में यदि भवन की छत से पानी रिसने लगे या कमरों में सीलन और नमी की समस्या बनी रहे तो इसका असर सिर्फ कर्मचारियों पर नहीं, बल्कि सरकारी कामकाज पर भी पड़ना स्वाभाविक है।
बरसात के दिनों में कहीं बाल्टी रखकर पानी रोकने की नौबत आती है तो कहीं फाइलों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुरक्षित स्थान पर रखना पड़ता है। सरकारी कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह स्थिति असुविधा के साथ-साथ महत्वपूर्ण दस्तावेजों की सुरक्षा का सवाल भी खड़ा करती है।

सरकारी आवासों की हालत भी चिंता का विषय
समस्या केवल कार्यालय भवनों तक सीमित नहीं है। घरघोड़ा क्षेत्र में विभिन्न विभागों के कर्मचारी आवासों की स्थिति को लेकर भी शिकायतें सामने आती रही हैं।
शिक्षक कॉलोनी, वन विभाग के आवास, पुलिस विभाग के आवास, जल संसाधन विभाग से जुड़े भवन तथा अन्य कर्मचारी आवासों में पुराने निर्माण, छत से पानी का रिसाव, दीवारों में सीलन और रखरखाव की कमी जैसी समस्याएं बताई जा रही हैं।
सरकारी आवास में रहने वाले कर्मचारियों के लिए बरसात का मौसम ऐसे में अतिरिक्त परेशानी लेकर आता है। परिवार के साथ रहने वाले कर्मचारियों को सबसे पहले छत और कमरों में पानी रोकने की व्यवस्था करनी पड़ती है। कुछ जगहों पर तिरपाल जैसे अस्थायी उपायों का सहारा लिए जाने की बात भी सामने आती है।
सवाल यह है कि जिन कर्मचारियों से सरकार दुर्गम और ग्रामीण क्षेत्रों में रहकर अपनी जिम्मेदारियां निभाने की अपेक्षा करती है, उनके आवासों का नियमित रखरखाव भी क्या उसी प्राथमिकता से नहीं होना चाहिए?

हर साल मानसून आता है, फिर तैयारी अधूरी क्यों?
सरकारी भवनों की मरम्मत का मामला अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है। मानसून हर वर्ष आता है और बरसात से पहले भवनों की स्थिति का निरीक्षण तथा आवश्यक मरम्मत सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए।
ऐसे में सवाल उठता है कि यदि किसी भवन की छत लंबे समय से खराब है, दीवारों में लगातार सीलन है या भवन की संरचना मरम्मत मांग रही है, तो बरसात आने से पहले इसकी मरम्मत क्यों नहीं हो पाती?
क्या विभागों द्वारा भवनों की स्थिति का नियमित भौतिक निरीक्षण किया जाता है?
क्या जर्जर भवनों की प्राथमिकता सूची तैयार होती है?
क्या मरम्मत के प्रस्ताव समय पर भेजे जाते हैं?
और यदि प्रस्ताव भेजे जाते हैं तो उन पर कार्रवाई की स्थिति क्या है?
इन सवालों के जवाब संबंधित विभागों और जिम्मेदार अधिकारियों से अपेक्षित हैं।

राजस्व और विकास के बीच सरकारी परिसंपत्तियों का रखरखाव भी जरूरी
रायगढ़ जिले की पहचान केवल खनन और उद्योगों से होने वाले राजस्व तक सीमित नहीं है। जिले में सरकारी संस्थानों और परिसंपत्तियों का भी बड़ा नेटवर्क है। स्कूलों से लेकर कार्यालयों और कर्मचारी आवासों तक इन परिसंपत्तियों का निर्माण जनता के पैसे से हुआ है।
इसलिए उनका समय-समय पर रखरखाव भी प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
विकास का मतलब केवल नई सड़क, नया भवन या नई योजना शुरू करना नहीं है। पहले से मौजूद सरकारी परिसंपत्तियों को उपयोगी और सुरक्षित बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि करोड़ों रुपये की लागत से बने सरकारी भवन कुछ वर्षों बाद ही मरम्मत की स्थिति में पहुंच जाते हैं और समय पर रखरखाव नहीं होता, तो यह सरकारी संसाधनों के बेहतर प्रबंधन पर सवाल खड़ा करता है।

फाइलों में मरम्मत या जमीन पर काम?
घरघोड़ा में सरकारी भवनों की मौजूदा स्थिति के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि संबंधित विभागों के रिकॉर्ड में इन भवनों की स्थिति क्या दर्ज है।
यदि भवनों की खराब स्थिति पहले से विभाग के संज्ञान में है, तो अब तक कितने भवनों का निरीक्षण किया गया? कितने भवनों के लिए मरम्मत प्रस्ताव तैयार किए गए? कितने प्रस्ताव स्वीकृत हुए और वास्तव में कितने भवनों में काम कराया गया?
इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है।
क्योंकि किसी सरकारी भवन की वास्तविक स्थिति का पता कागजों से अधिक मौके पर जाकर ही लगाया जा सकता है।
अब खानापूर्ति नहीं, समयबद्ध मरम्मत की जरूरत
घरघोड़ा के सरकारी भवनों और कर्मचारी आवासों को लेकर यदि शिकायतें सही हैं तो प्रशासन को इसे सामान्य मरम्मत की समस्या मानकर टालने के बजाय प्राथमिकता के आधार पर जांच करनी चाहिए।
सबसे पहले सभी संबंधित भवनों का भौतिक निरीक्षण कराया जाए। इसके बाद भवनों को उनकी स्थिति के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जा सकता है—जहां मामूली मरम्मत की जरूरत है वहां तत्काल कार्य हो, गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त भवनों की तकनीकी जांच कराई जाए और जिन भवनों की मरम्मत संभव नहीं है, उनके स्थान पर नए भवन या पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाए।
साथ ही कर्मचारी आवासों की स्थिति का भी विभागवार सर्वे कराया जाना जरूरी है।
जवाबदेही सिर्फ भवन की नहीं, व्यवस्था की भी
बारिश में छत से पानी टपकना अपने आप में कोई बड़ी खबर नहीं होती, लेकिन जब यही स्थिति सरकारी कार्यालयों और सरकारी आवासों में बार-बार सामने आए तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा का विषय जरूर बन जाती है।
एक कर्मचारी यदि टपकती छत के नीचे बैठकर सरकारी फाइल निपटा रहा है और दूसरे कमरे में उसका परिवार खराब आवास की समस्या से जूझ रहा है, तो यह केवल असुविधा नहीं बल्कि सरकारी परिसंपत्तियों के रखरखाव की प्राथमिकताओं पर सवाल है।
घरघोड़ा के कर्मचारी और आम नागरिक अब यह जानना चाहेंगे कि इन भवनों की मरम्मत के लिए क्या योजना है, बजट की स्थिति क्या है और काम कब तक शुरू होगा।
बारिश इस साल भी चली जाएगी। पानी सूख जाएगा, छतें भी शायद कुछ समय के लिए शांत हो जाएंगी। लेकिन यदि मरम्मत नहीं हुई तो अगली बारिश में वही समस्या फिर सामने आएगी।
इसलिए सवाल यह नहीं कि इस बरसात में बाल्टी कहां रखी जाएगी।
सवाल यह है कि अगली बरसात आने से पहले सरकारी भवनों की छतें ठीक होंगी या नहीं?
अब निगाहें घरघोड़ा के जिम्मेदार विभागों और प्रशासन पर हैं।
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