संघर्ष रंग लाया: बरौद के विस्थापितों को बढ़ा मुआवजा, 6.31 लाख प्रति परिवार का रास्ता साफ

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़/घरघोड़ा।
लंबे समय से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे ग्राम बरौद के एसईसीएल परियोजना प्रभावित विस्थापित परिवारों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। वर्षों से जारी शांतिपूर्ण आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद आखिरकार मुआवजे में वृद्धि का रास्ता साफ हो गया है। यह फैसला न केवल आर्थिक रूप से राहत देने वाला है, बल्कि संघर्ष की जीत का प्रतीक भी माना जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, कोल इंडिया की पुनर्वास नीति 2012 के तहत पहले विस्थापित परिवारों को 3,31,500 रुपये का लाभ दिया जा रहा था। हालांकि, इसे अपर्याप्त बताते हुए प्रभावित परिवार वर्ष 2019 से लगातार मुआवजा बढ़ाने की मांग कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन किया, आर्थिक नाकेबंदी जैसे कदम उठाए और एसईसीएल कार्यालय से लेकर कलेक्ट्रेट परिसर तक अपनी आवाज बुलंद की।
इन लगातार प्रयासों का परिणाम 4 नवंबर 2025 को सामने आया, जब एसईसीएल बिलासपुर मुख्यालय ने मुआवजे में वृद्धि का निर्णय लिया। नए निर्णय के तहत प्रत्येक विस्थापित परिवार को अतिरिक्त 3 लाख रुपये दिए जाएंगे। इस तरह कुल मुआवजा बढ़कर 6,31,500 रुपये प्रति परिवार हो गया है।
बताया जा रहा है कि कुल 315 प्रभावित परिवारों में से अब तक 260 परिवारों को इस बढ़ी हुई राशि का भुगतान किया जा चुका है, जबकि शेष परिवारों के भुगतान की प्रक्रिया जारी है। इससे प्रभावित क्षेत्र में संतोष का माहौल है, हालांकि कुछ परिवार अब भी पूर्ण भुगतान की प्रतीक्षा में हैं।
इस पूरे संघर्ष में स्थानीय स्तर पर नेतृत्व और समन्वय की भूमिका भी अहम रही। ऊर्जाधानी भू-विस्थापित किसान कल्याण समिति, कोरबा के अध्यक्ष श्री सपूरन कुलदीप सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और मीडिया की सक्रियता ने मुद्दे को लगातार जीवित रखा। प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन के साथ संवाद के जरिए समाधान निकालने की कोशिशें भी समानांतर चलती रहीं।
विस्थापित परिवारों ने इस निर्णय के लिए सभी सहयोगियों—पंचायत प्रतिनिधियों, समाजसेवियों, मीडिया कर्मियों, जिला प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन—के प्रति आभार जताया है। उनका कहना है कि यह केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि उनके अधिकारों की मान्यता है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि पुनर्वास केवल मुआवजे तक सीमित नहीं होना चाहिए। प्रभावित परिवारों के स्थायी आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक पुनर्स्थापन की दिशा में भी ठोस कदम उठाना जरूरी है, ताकि विकास की कीमत चुकाने वालों को न्याय मिल सके।
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