जिंदल जनसुनवाई विवाद: सत्र न्यायालय से निराशा के बाद हाईकोर्ट से राहत, सरपंच समेत सभी आरोपियों को अग्रिम जमानत

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़/तमनार। जिंदल परियोजना की जनसुनवाई से जुड़े बहुचर्चित विवाद में लिबरा गांव की सरपंच लक्ष्मी सिदार, उपसरपंच सरस्वती सिदार और सरपंच पुत्र कमलेश उर्फ कुशलेन्द्र सहित अन्य आरोपियों को आखिरकार हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है। अपर सत्र न्यायालय, घरघोड़ा द्वारा अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां सुनवाई के उपरांत सभी आरोपियों को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी गई। इस आदेश के साथ ही उनकी संभावित गिरफ्तारी पर फिलहाल विराम लग गया है।
घटना की पृष्ठभूमि: जनसुनवाई बना विवाद का कारण
मामले की जड़ 18 दिसंबर 2025 की रात की घटना से जुड़ी है। आरोप है कि सरपंच लक्ष्मी सिदार अपने समर्थकों के साथ करीब 15-20 ग्रामीणों को लेकर जिंदल समर्थक सुभाषिनी गुप्ता के घर पहुंचीं। वहां कथित तौर पर भूमि अधिग्रहण के समर्थन को लेकर विवाद हुआ, जिसके दौरान अशोभनीय भाषा का प्रयोग करते हुए जान से मारने की धमकी दी गई।
इस घटना के आधार पर तमनार थाना में अपराध क्रमांक 290/2025 के तहत भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं—333, 296, 351(3) एवं 3(5)—के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया। इसके अलावा एक अन्य शिकायतकर्ता सौदामिनी पटनायक की रिपोर्ट पर अपराध क्रमांक 291/2025 भी दर्ज हुआ।
सत्र न्यायालय में मिली थी निराशा
आरोपियों की ओर से मिश्रा चेंबर, रायगढ़ के अधिवक्ता अशोक कुमार मिश्रा एवं आशीष कुमार मिश्रा ने सत्र न्यायालय, घरघोड़ा में अग्रिम जमानत की मांग की थी। उनका तर्क था कि आरोपित धाराओं में अधिकांश जमानतीय हैं और धारा 333 में भी अधिकतम सजा सात वर्ष से अधिक नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय—“अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य” तथा “सतेन्द्र कुमार अंटिल बनाम सीबीआई”—का हवाला देते हुए गिरफ्तारी को अनावश्यक बताया।
हालांकि, पुलिस ने जमानत आवेदन का कड़ा विरोध किया और प्रकरण को गंभीर बताते हुए लिखित आपत्ति प्रस्तुत की। सुनवाई के बाद अपर सत्र न्यायाधीश ने आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जमानत याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने माना जमानत योग्य मामला
सत्र न्यायालय से राहत न मिलने पर मामला हाईकोर्ट ले जाया गया, जहां मिश्रा चेंबर के एसोसिएट अधिवक्ता हरि अग्रवाल ने आरोपियों की ओर से पक्ष रखा। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए इसे जमानत योग्य मानते हुए सभी आरोपियों को अग्रिम जमानत दे दी।
वकीलों की प्रतिक्रिया: ‘नागरिक स्वतंत्रता की जीत’
हाईकोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए अधिवक्ता अशोक कुमार मिश्रा एवं आशीष कुमार मिश्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से बताते हैं कि सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में, यदि आरोपी जांच में सहयोग कर रहा है, तो गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने इन सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए निर्णय दिया, जो नागरिक स्वतंत्रता और न्याय के मूल्यों की रक्षा करता है।
स्थानीय स्तर पर बनी हुई है संवेदनशीलता
जिंदल परियोजना से जुड़े भूमि अधिग्रहण और जनसुनवाई को लेकर क्षेत्र में पहले से ही संवेदनशील माहौल रहा है। ऐसे में इस मामले को लेकर ग्रामीणों के बीच चर्चाएं तेज हैं और प्रशासन भी स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
यह प्रकरण केवल कानूनी राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन जमीनी तनावों की भी झलक देता है, जो औद्योगिक परियोजनाओं और स्थानीय समुदायों के बीच समय-समय पर उभरते रहते हैं।
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