कॉलेजों में अतिथि व्याख्याता की एमफिल और पीएचडी पर उठे सवाल: नौकरी के दौरान हासिल डिग्रियों की वैधता जांच के घेरे में

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़। जिले के महाविद्यालयों में अतिथि व्याख्याताओं की नियुक्ति को लेकर एक बार फिर पारदर्शिता और नियमों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उच्च शिक्षा विभाग द्वारा जारी स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, ऐसे मामलों के सामने आने की बात कही जा रही है जिनमें व्याख्याताओं ने अध्यापन अवधि के दौरान ही बिना विधिवत अनुमति के एमफिल और पीएचडी की उपाधियां प्राप्त कर लीं।
जानकारी के अनुसार, विभागीय नियमों में स्पष्ट प्रावधान है कि कोई भी अतिथि व्याख्याता सेवा के दौरान बिना सक्षम प्राधिकारी—जैसे विश्वविद्यालय के कुलसचिव या संबंधित कॉलेज के प्राचार्य—की अनुमति और स्वीकृत अवकाश के उच्चतर उपाधि प्राप्त नहीं कर सकता। इसके बावजूद, आरोप हैं कि कुछ आवेदकों ने नौकरी जारी रखते हुए ही अन्य विश्वविद्यालयों से उपाधि हासिल की, जो नियमों के प्रतिकूल माना जा रहा है।
सूत्रों का कहना है कि कई मामलों में संबंधित व्याख्याता न केवल कॉलेज में नियमित रूप से अध्यापन करते रहे, बल्कि समानांतर रूप से अन्य शहरों—जैसे बिलासपुर और रायपुर—में शोध कार्य भी पूर्ण कर लिया। विभागीय दृष्टि से यह स्थिति संदेहास्पद मानी जाती है, क्योंकि दोनों कार्यों को एक साथ नियमित रूप से करना व्यवहारिक और नियमानुसार संभव नहीं माना गया है।
उच्च शिक्षा विभाग ने ऐसे मामलों को लेकर पूर्व में कड़े निर्देश जारी करते हुए कहा था कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के रेग्युलेशन के अनुरूप ही उपाधि प्राप्त होना आवश्यक है। जिन प्रकरणों में उपाधि प्राप्ति की प्रक्रिया पर संदेह हो, उनकी सूक्ष्म जांच कराई जाए और केवल पात्र पाए जाने पर ही नियुक्ति दी जाए। साथ ही, यदि किसी चयन प्रक्रिया में अनियमितता सिद्ध होती है, तो संबंधित चयन समिति के सदस्यों और प्राचार्य के विरुद्ध भी कार्रवाई का प्रावधान है।
जिले के एक डिग्री कॉलेज में सामने आए प्रकरण में एक अतिथि व्याख्याता को विभागीय निर्देशों के आधार पर अपात्र घोषित किया गया था। संबंधित व्यक्ति द्वारा न्यायालय की शरण लेने पर उसे वर्तमान शैक्षणिक सत्र तक सेवा जारी रखने की अंतरिम राहत मिली, हालांकि इसके बाद प्रबंधन स्तर पर आगे की कार्रवाई को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है।
यह पूरा मामला न केवल नियुक्ति प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में नियमों के पालन और अकादमिक मानकों की गंभीरता को भी कटघरे में खड़ा करता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विभाग इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाता है।
अन्य अधिक खबरों के लिए स्क्रॉल डाउन करें 👇⬇️