डबल मर्डर केस: अंधविश्वास का अंधेरा और न्याय का उजाला—मां समेत चार दोषियों को उम्रकैद

Journalist Amardeep chauhan
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सक्ती।
छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले के छोटे से गांव तांदुलडीह में घटित दोहरे हत्याकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आधुनिक समाज में भी अंधविश्वास किस हद तक इंसान की सोच पर हावी हो सकता है। लगभग डेढ़ साल पहले हुई इस हृदयविदारक घटना में अदालत ने आखिरकार अपना फैसला सुना दिया है। न्यायालय ने ठोस साक्ष्यों और परिस्थितिजन्य तथ्यों के आधार पर मृतकों की मां सहित परिवार के चार सदस्यों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है।
अदालत का सख्त संदेश
प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश प्रशांत कुमार शिवहरे की अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि अंधविश्वास के नाम पर की गई हिंसा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती। कोर्ट ने मृतकों की मां फिरीतबाई सिदार, बहनें अमरिका और चंद्रिका सिदार तथा भाई विशाल सिदार को आजीवन सश्रम कारावास की सजा सुनाई। साथ ही प्रत्येक पर एक-एक हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया। जुर्माना अदा नहीं करने पर अतिरिक्त कारावास का प्रावधान भी रखा गया है।
जब ‘साधना’ बन गई साजिश
अक्टूबर 2024 में बाराद्वार थाना क्षेत्र के तांदुलडीह गांव में यह सनसनीखेज घटना सामने आई थी। पड़ोसियों को घर से लगातार आ रही चीख-पुकार और संदिग्ध गतिविधियों ने चौंका दिया था। जब दरवाजा खुलवाया गया, तो भीतर का दृश्य किसी भयावह कथा से कम नहीं था। परिवार के सदस्य कथित ‘गुरु साधना’ में लीन थे, जबकि दो युवक—विक्रम (विकास) और विक्की सिदार—अचेत अवस्था में पड़े मिले, जिन्हें बाद में मृत घोषित किया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पुलिस के पहुंचने के बाद भी परिवार के सदस्य इसे मौत मानने को तैयार नहीं थे। वे इसे ‘आध्यात्मिक प्रक्रिया’ बताते हुए दावा कर रहे थे कि दोनों युवक ‘सत्संग सुनने गए हैं’ और साधना से वापस आ जाएंगे।
जांच में खुला खौफनाक सच
पुलिस, फॉरेंसिक टीम और चिकित्सकीय जांच ने इस ‘आध्यात्मिक आवरण’ को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। जांच में सामने आया कि परिवार लंबे समय से तंत्र-मंत्र और कथित बाबाओं के प्रभाव में था। मृतक दोनों भाई इस अंधविश्वास का विरोध करते थे और परिवार को इससे दूर रहने की सलाह देते थे।
यही विरोध उनकी मौत का कारण बना। आरोपियों ने कथित ‘गुरु पूजा’ के नाम पर उन्हें बुलाया और योजनाबद्ध तरीके से उनकी हत्या कर दी। घटनास्थल से बरामद कीटनाशक, जड़ी-बूटियां, दस्तावेज और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों ने पूरे घटनाक्रम की परतें खोल दीं।
समाज के लिए सबक
यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। अंधविश्वास, अज्ञानता और कथित बाबाओं के प्रभाव में आकर किस तरह एक परिवार अपने ही खून का दुश्मन बन बैठा—तांदुलडीह की यह घटना इसका जीता-जागता उदाहरण है।
अदालत का यह फैसला न केवल पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि अंधविश्वास की आड़ में अपराध करने वालों को कानून किसी भी सूरत में बख्शेगा नहीं। अब जरूरत है कि समाज जागरूक हो, वैज्ञानिक सोच को अपनाए और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सके।
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