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“पहले पुरानी जमीनों का हिसाब, फिर नए उद्योग की बात”: रायगढ़ में सिंघल स्टील के खिलाफ 20 गांवों का उबाल, जनसुनवाई से पहले चेतावनी

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com

रायगढ़, 4 जून।
औद्योगिक विस्तार की आड़ में भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय संकट से जूझ रहे रायगढ़ जिले में अब ग्रामीणों का सब्र जवाब देता नजर आ रहा है। प्रस्तावित सिंघल स्टील प्राइवेट लिमिटेड के ग्रीनफील्ड स्टील प्लांट के खिलाफ करीब 20 गांवों के किसानों और स्थानीय नागरिकों ने खुलकर मोर्चा खोल दिया है। जनसुनवाई से पहले ही क्षेत्र में विरोध का स्वर तेज हो गया है और ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कह दिया है—“रायगढ़ अब कॉरपोरेट प्रयोगशाला नहीं बनेगा।”

पतरापाली, कोतरलिया सहित आसपास के गांवों में आयोजित बैठक में ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कंपनी प्रबंधन के सामने कई तीखे सवाल रखे। उनका कहना था कि जिला पहले से ही भारी औद्योगिक दबाव और प्रदूषण का दंश झेल रहा है। सौ से अधिक बड़े उद्योगों की मौजूदगी के बावजूद न तो पर्यावरणीय संतुलन बचा है और न ही किसानों की आजीविका सुरक्षित रह पाई है।

“जमीन गई, रोजगार नहीं मिला” — पुरानी परियोजनाओं पर उठे सवाल
बैठक में सबसे बड़ा मुद्दा पुराने भूमि अधिग्रहण का उठा। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पूर्व में आई कई कंपनियों ने बड़े वादों के साथ जमीन तो अधिग्रहित कर ली, लेकिन परियोजनाएं वर्षों तक धरातल पर नहीं उतरीं। परिणामस्वरूप किसान अपनी जमीन से भी वंचित हो गए और रोजगार के वादे भी अधूरे रह गए।

ग्रामीणों ने वीजा स्टील और जेएसडब्ल्यू जैसी कंपनियों का उदाहरण देते हुए कहा कि सैकड़ों-हजारों एकड़ जमीन आज भी निष्क्रिय पड़ी है। इन जमीनों पर न उद्योग लगे और न ही किसानों को वापस अधिकार मिला। प्रभावित परिवार आज भी पुनर्वास और मुआवजे के लिए भटक रहे हैं।

नई परियोजना से पहले ‘पुरानी लूट’ का हिसाब जरूरी
सिंघल स्टील की प्रस्तावित परियोजना के लिए लगभग एक हजार एकड़ भूमि की आवश्यकता बताई जा रही है। इस पर ग्रामीणों ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जब तक पुरानी अधिग्रहित जमीनों का उपयोग, मुआवजा और पुनर्वास का मुद्दा स्पष्ट नहीं होता, तब तक नई परियोजना के लिए एक इंच जमीन भी नहीं दी जाएगी।

ग्रामीणों ने मांग रखी कि यदि कंपनी तय समय सीमा में परियोजना शुरू नहीं करती है, तो अधिग्रहित भूमि अधिकतम दो वर्ष के भीतर मूल भू-स्वामियों को वापस लौटाने का कानूनी प्रावधान सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही रोजगार, पुनर्वास, आवास और सामाजिक सुरक्षा की लिखित गारंटी अनिवार्य की जाए।

प्रदूषण और स्वास्थ्य पर गहराता संकट
बैठक में यह भी सामने आया कि उद्योगों के कारण क्षेत्र में वायु और जल प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। खेतों की उर्वरा शक्ति कम हो रही है, भूजल दूषित हो चुका है और ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है। ऐसे में एक और स्टील प्लांट स्थापित करने की योजना को लेकर लोगों में गहरी चिंता है।

जनसुनवाई अब औपचारिकता नहीं, निर्णायक मोड़
6 जुलाई को प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई को लेकर ग्रामीणों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होगी। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ठोस और लिखित आश्वासन नहीं मिला, तो विरोध आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।

ग्रामीणों का कहना है कि जनसुनवाई में अब केवल परियोजना नहीं, बल्कि जमीन, पर्यावरण और अधिकारों का व्यापक मुद्दा उठेगा। वे कलेक्टर और राज्य शासन को ज्ञापन सौंपने की तैयारी में भी हैं।

“जमीन व्यापार नहीं, जीवन का आधार”
बैठक के अंत में किसानों ने एक स्वर में कहा कि उनकी जमीन कोई व्यापारिक वस्तु नहीं है, बल्कि उनके जीवन और भविष्य का आधार है। यदि उनकी आशंकाओं और अधिकारों की अनदेखी की गई, तो वे हर स्तर पर संघर्ष के लिए तैयार हैं।

रायगढ़ में उभरता यह विरोध अब केवल एक परियोजना का विरोध नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास मॉडल पर सवाल खड़ा करता जनआंदोलन बनता जा रहा है। आने वाली 6 जुलाई की जनसुनवाई इस संघर्ष की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकती है।

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Amar Chouhan

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