दरिंदगी के बाद सिस्टम की चूक: मूक-बधिर पीड़िता की मौत ने उठाए कई असहज सवाल

Journalist Amardeep chauhan
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जशपुर।
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से सामने आया यह मामला केवल एक जघन्य अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि उससे भी अधिक गंभीर रूप से व्यवस्था की संवेदनहीनता और लापरवाही का आईना है। एक मूक-बधिर युवती, जो पहले ही हैवानियत का शिकार हुई, अंततः उस सिस्टम की अनदेखी के कारण जिंदगी हार बैठी, जिसका दायित्व उसकी सुरक्षा और उपचार था।
घटना कुनकुरी क्षेत्र की है, जहां 3 अप्रैल को युवती के साथ दुष्कर्म हुआ। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया, लेकिन इसके बाद पीड़िता की देखभाल और चिकित्सा प्रक्रिया में जो खामियां सामने आईं, वे कई स्तरों पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।
पीड़िता बोलने और सुनने में असमर्थ थी। ऐसे में चिकित्सकीय जांच और निगरानी को और अधिक सतर्कता के साथ किया जाना चाहिए था। किंतु आरोप है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रारंभिक जांच महज औपचारिकता बनकर रह गई। दुष्कर्म की पुष्टि तो की गई, परंतु आंतरिक चोटों या संभावित संक्रमण की गहराई से जांच नहीं की गई।
इसके बाद पीड़िता को जशपुर स्थित सखी सेंटर भेजा गया। नियमानुसार, ऐसी परिस्थितियों में पीड़िता को सीमित अवधि तक ही वहां रखा जा सकता है और आगे की प्रक्रिया के लिए न्यायालयीन अनुमति आवश्यक होती है। लेकिन यहां भी नियमों की अनदेखी हुई। पीड़िता को निर्धारित समय से अधिक अवधि तक बिना आवश्यक कानूनी अनुमति के वहीं रखा गया।
बताया जा रहा है कि इस दौरान उसकी शारीरिक स्थिति पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। 19 मई को जब उसे तेज पेट दर्द की शिकायत हुई, तब जाकर उसे जिला अस्पताल ले जाया गया। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।
मामले ने तब और गंभीर मोड़ लिया, जब पोस्टमार्टम के दौरान पीड़िता के अंदरूनी अंगों में सेफ्टी पिन पाए जाने की पुष्टि हुई। इस तथ्य ने प्रारंभिक चिकित्सकीय जांच की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने बोतल के कॉर्क मिलने की बात से इनकार किया है, लेकिन सेफ्टी पिन की पुष्टि ने पूरे घटनाक्रम को और चिंताजनक बना दिया है।
यह भी सामने आया है कि पीड़िता के परिजनों की तलाश के प्रयास नगण्य रहे। संबंधित विभागों—स्वास्थ्य और महिला एवं बाल विकास—के बीच समन्वय की कमी स्पष्ट रूप से दिखी। जिम्मेदारी तय करने के बजाय प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाकर मामले को औपचारिक रूप से निपटाने की प्रवृत्ति हावी रही।
घटना के उजागर होने के बाद जिला प्रशासन ने मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए हैं। अधिकारियों का कहना है कि जांच के निष्कर्षों के आधार पर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई उस खोई हुई जिंदगी की भरपाई कर पाएगी? और क्या यह सिस्टम भविष्य में ऐसी किसी अन्य पीड़िता के साथ होने वाली लापरवाही को रोकने में सक्षम होगा?
यह मामला केवल अपराधियों के खिलाफ सख्त सजा की मांग नहीं करता, बल्कि उन व्यवस्थागत खामियों को सुधारने की भी जरूरत बताता है, जिनके चलते एक पीड़िता न्याय और उपचार दोनों से वंचित रह गई।
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