“575 ट्रेलरों का ‘काला सफर’: एनटीपीसी में कोयला आपूर्ति घोटाले ने खोली सिस्टम की परतें”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़, 2 मई 2026।
देश की ऊर्जा आपूर्ति की रीढ़ मानी जाने वाली NTPC Limited की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। छत्तीसगढ़ के NTPC Lara Plant से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न केवल वित्तीय अनियमितताओं की आशंका को बल दिया है, बल्कि पूरे आपूर्ति तंत्र की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
करीब एक वर्ष की अवधि में 575 ट्रेलर कोयला, जो रिकॉर्ड में प्लांट के लिए रवाना दिखाया गया, वास्तविकता में गंतव्य तक पहुंचा ही नहीं। मामला अब Central Bureau of Investigation (CBI) की जांच के दायरे में है और इसमें कई अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है।
रिकॉर्ड और हकीकत के बीच बड़ा अंतर
जांच में सामने आया कि 28 अप्रैल 2023 से 22 मई 2024 के बीच कोयला आपूर्ति के दस्तावेजों और वास्तविक प्राप्ति में भारी अंतर था। वित्तीय प्रबंधन विभाग द्वारा की गई आंतरिक समीक्षा में यह स्पष्ट हुआ कि जिन ट्रकों के लिए भुगतान किया गया, उनमें से सैकड़ों की एंट्री प्लांट के गेट रजिस्टर में दर्ज ही नहीं है।
विशेष रूप से अक्टूबर 2023 का आंकड़ा चौंकाने वाला रहा, जब एक ही महीने में 154 ट्रेलर ‘गायब’ पाए गए। प्रारंभिक आकलन के अनुसार, इससे लाखों रुपये का सीधा नुकसान हुआ, जबकि पूरे प्रकरण का दायरा करोड़ों तक पहुंच सकता है।
सुरक्षा व्यवस्था भी सवालों के घेरे में
प्लांट की सुरक्षा व्यवस्था Central Industrial Security Force (CISF) के जिम्मे है। हर वाहन की एंट्री गेट पर दर्ज होती है, जिससे यह सिस्टम सामान्यतः पारदर्शी माना जाता है।
लेकिन जब वित्तीय रिकॉर्ड और गेट एंट्री का मिलान किया गया, तो बड़ी संख्या में ट्रकों का कोई अता-पता नहीं मिला। इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि यह केवल दस्तावेजी गड़बड़ी नहीं, बल्कि संगठित स्तर पर की गई हेराफेरी हो सकती है।
CBI की कार्रवाई और दर्ज एफआईआर
मामले की गंभीरता को देखते हुए एनटीपीसी प्रबंधन ने जांच Central Bureau of Investigation को सौंप दी। विस्तृत जांच के बाद पांच अधिकारियों सहित अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।
जिन अधिकारियों के नाम सामने आए हैं, वे विभिन्न परियोजनाओं और विभागों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत रहे हैं—जिससे यह संकेत मिलता है कि यह मामला केवल एक स्तर तक सीमित नहीं है।
आपूर्ति श्रृंखला में ‘सिस्टमेटिक फेलियर’ के संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रकरण केवल वित्तीय नुकसान तक सीमित नहीं है। यह पूरी सप्लाई चेन—खदान से प्लांट तक—में मौजूद निगरानी तंत्र की कमजोरी को उजागर करता है।
जब खदानों से उत्पादन घटता है और वैकल्पिक स्रोतों से कोयला मंगाया जाता है, तब निगरानी और पारदर्शिता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में यदि ट्रैकिंग, सत्यापन और जवाबदेही के स्तर पर चूक होती है, तो उसका लाभ संगठित तरीके से उठाया जा सकता है।
फिलहाल मामला जांच के अधीन है और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है। लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि देश की प्रमुख सार्वजनिक कंपनियों में आंतरिक नियंत्रण और निगरानी तंत्र कितने प्रभावी हैं।
यदि आरोप साबित होते हैं, तो यह न केवल संबंधित अधिकारियों के लिए बल्कि पूरी प्रणाली के लिए एक गंभीर चेतावनी साबित होगा।
(नोट: प्रकरण की जांच जारी है, अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होंगे।)
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