“मृत्युभोज नहीं, मानवता का महादान” — बटालियन के जवान दंपति ने देहदान-अंगदान का लिया संकल्प, समाज को दिया नई दिशा का संदेश

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़, 30 अप्रैल।
समाज में प्रचलित परंपराओं के बीच जब कोई परिवार परंपरा से ऊपर उठकर मानवता को प्राथमिकता देता है, तो वह सिर्फ एक निर्णय नहीं, बल्कि एक नई सामाजिक सोच की शुरुआत बन जाता है। ऐसा ही एक प्रेरक उदाहरण रायगढ़ में सामने आया है, जहां 6वीं बटालियन में पदस्थ आरक्षक सोहनलाल साहू और उनकी पत्नी रुकमणि साहू ने मरणोपरांत देहदान और अंगदान का संकल्प लेकर समाज के सामने एक सार्थक विकल्प प्रस्तुत किया है।
यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है, जब अधिकांश परिवार मृत्यु के बाद भारी-भरकम खर्च वाले मृत्युभोज जैसी परंपराओं में उलझे रहते हैं। साहू दंपति ने न केवल इस प्रथा से दूरी बनाने का संकल्प लिया है, बल्कि उस राशि को जनहित के कार्यों में लगाने का भी निर्णय किया है। उनका मानना है कि किसी की मृत्यु के बाद दिखावे पर खर्च करने से बेहतर है कि वही संसाधन समाज के जरूरतमंद लोगों के काम आएं।
मानवता के पक्ष में एक मजबूत संदेश
देहदान और अंगदान को चिकित्सा क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। एक ओर जहां देहदान मेडिकल शिक्षा और शोध को नई दिशा देता है, वहीं अंगदान कई जरूरतमंद मरीजों को नया जीवन प्रदान कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक व्यक्ति का अंगदान कई जिंदगियां बचा सकता है, लेकिन इसके बावजूद समाज में जागरूकता का स्तर अभी भी सीमित है।
रायगढ़ जिले में इस दिशा में पहल करने वाले लोगों की संख्या बेहद कम है। ऐसे में सोहनलाल साहू और उनकी पत्नी का यह निर्णय न केवल सराहनीय है, बल्कि एक सामाजिक संदेश भी है। खास बात यह है कि वे अब तक 12 से 15 लोगों को इस दिशा में प्रेरित भी कर चुके हैं। स्वयं सोहनलाल साहू 14 बार रक्तदान कर चुके हैं, जो उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता को और मजबूत बनाता है।
सम्मान की मांग और जागरूकता का सवाल
रुकमणि साहू ने इस विषय को लेकर राज्य स्तर पर भी पहल की है। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि देहदान और अंगदान करने वाले व्यक्तियों को अन्य राज्यों की तरह राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाए। उनका तर्क है कि केवल प्रशस्ति पत्र देना पर्याप्त नहीं है, जब तक समाज में इस विषय को सम्मान और प्रेरणा के रूप में स्थापित नहीं किया जाएगा, तब तक व्यापक जागरूकता संभव नहीं है।
सूत्रों के अनुसार, इस पत्र पर शासन स्तर पर संज्ञान लिया गया है और संबंधित विभाग को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
परंपरा बनाम परिवर्तन की बहस
मृत्युभोज जैसी परंपराएं वर्षों से समाज में चली आ रही हैं, लेकिन बदलते समय के साथ इन पर पुनर्विचार की जरूरत महसूस की जा रही है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर यह परंपरा अतिरिक्त बोझ डालती है, जबकि इसका सामाजिक लाभ सीमित ही होता है। इसके विपरीत, देहदान और अंगदान जैसे निर्णय सीधे तौर पर मानव जीवन और समाज के भविष्य से जुड़े होते हैं।
सभी समाज के लिए संदेश
साहू दंपति का यह कदम एक स्पष्ट संदेश देता है—
मृत्यु के बाद भी जीवन को अर्थ दिया जा सकता है। जरूरत है तो सिर्फ सोच बदलने की।
अब यह समाज पर निर्भर है कि वह दिखावे की परंपराओं को आगे बढ़ाता है या मानवता के इस महादान को अपनाकर एक नई दिशा तय करता है।
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