“मिलूपारा हत्याकांड का पर्दाफाश: भरोसे की आड़ में छिपा कातिल, पुलिस ने ऐसे खोली ‘अंधे कत्ल’ की गुत्थी”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़ जिले के तमनार थाना क्षेत्र में हुए बहुचर्चित मिलूपारा हत्याकांड ने आखिरकार अपना सच उगल दिया है। जिस घटना को शुरुआत में अज्ञात हमलावरों का सुनियोजित अपराध माना जा रहा था, वह दरअसल एक बेहद चौंकाने वाली सच्चाई लेकर सामने आई—मृतक का अपना साथी ही उसका कातिल निकला।
9 मार्च की रात ग्राम मिलूपारा सिदारपारा के नहर पार इलाके में चौकीदारी कर रहे 46 वर्षीय लखन उर्फ धरभईया चौधरी की संदिग्ध मौत ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी थी। अगले दिन सुबह खेत की मेड़ पर उसका शव मिलने के बाद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू की। शरीर पर गंभीर चोटों के निशान थे, जो साफ इशारा कर रहे थे कि यह कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि सुनियोजित हत्या है।
शुरुआत में मृतक के साथ काम करने वाले 63 वर्षीय अजहर अली ने खुद को चश्मदीद बताते हुए एक कहानी गढ़ी—उसने दावा किया कि 4-5 अज्ञात लोग आए, दोनों पर हमला किया और लखन को उठाकर ले गए। यह कहानी सुनने में जितनी गंभीर थी, जांच में उतनी ही कमजोर साबित होने लगी।

तमनार पुलिस ने इस मामले को सतही तौर पर नहीं लिया। घटनास्थल की बारीकी से जांच, एफएसएल टीम और डॉग स्क्वाड की मदद, और आसपास के लोगों से लगातार पूछताछ—इन सबके बीच एक महत्वपूर्ण बात सामने आई: जिस इलाके में कथित हमलावरों की बात कही गई, वहां किसी भी बाहरी व्यक्ति की मौजूदगी का कोई संकेत नहीं मिला।
मामले की दिशा तब बदली, जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में एक छोटा-सा लेकिन निर्णायक सुराग मिला—मृतक के मुंह में प्लास्टिक का एक टुकड़ा। यह मामूली दिखने वाला साक्ष्य ही पूरे केस की कुंजी बन गया। पुलिस ने इसे जोड़ते हुए जांच को आगे बढ़ाया और संदेह की सुई बार-बार उसी व्यक्ति की ओर घूमने लगी, जो खुद को गवाह बता रहा था।
अजहर अली से जब वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक तरीकों से पूछताछ की गई, तो उसकी कहानी बार-बार बदलने लगी। आखिरकार सख्ती और सटीक पूछताछ के आगे वह टूट गया और उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया।
उसने बताया कि घटना वाली रात खाना बनाने को लेकर दोनों के बीच विवाद हुआ, जो मारपीट में बदल गया। गुस्से में उसने टार्च से लखन के चेहरे पर कई वार किए और फिर गला दबाकर उसकी हत्या कर दी। वारदात के बाद उसने सबूत मिटाने की कोशिश की—खून से सनी टार्च को धो दिया, कपड़े जला दिए और पूरी घटना को अज्ञात हमलावरों की साजिश बताकर खुद को बचाने की कोशिश की।

लेकिन एक छोटी-सी चूक—टार्च का प्लास्टिक टुकड़ा—उसके सारे षड्यंत्र पर भारी पड़ गया।
पुलिस ने आरोपी के कब्जे से वही टार्च बरामद की, जिसका हिस्सा मृतक के मुंह में मिला था। इसके साथ ही साक्ष्य छिपाने के आरोप में अतिरिक्त धाराएं भी जोड़ी गईं। आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया है।
इस पूरे मामले में तमनार पुलिस की सूझबूझ और पेशेवर जांच की अहम भूमिका रही। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह के निर्देशन और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अनिल सोनी व एसडीओपी धरमजयगढ़ सिद्धांत तिवारी के मार्गदर्शन में टीम ने जिस तरह बिना किसी ठोस सुराग के इस ‘अंधे कत्ल’ को सुलझाया, वह काबिल-ए-तारीफ है।
यह मामला एक बार फिर यह साबित करता है कि अपराधी चाहे कितनी भी चालाकी से कहानी गढ़े, लेकिन सच के धागे कहीं न कहीं छूट ही जाते हैं—और जब पुलिस उन धागों को पकड़ लेती है, तो पूरा जाल खुलने में देर नहीं लगती।
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