6 आदेश, 1 नोटिस… फिर भी जस का तस: रायगढ़ जिला पंचायत में जमे अधिकारी पर उठे बड़े सवाल

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़। शासन के आदेश कितने प्रभावी हैं और प्रशासनिक अनुशासन वास्तव में किस हद तक लागू होता है—इसका एक चौंकाने वाला उदाहरण रायगढ़ जिला पंचायत से सामने आया है। यहां पदस्थ अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी (अतिरिक्त सीईओ) नीलाराम पटेल का मामला इन दिनों प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
मार्च 2024 में स्थानांतरण आदेश जारी होने के बावजूद करीब ढाई वर्ष बीत जाने के बाद भी उनका कार्यमुक्त न होना न केवल नियमों की अनदेखी दर्शाता है, बल्कि शासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्थानांतरण हुआ, लेकिन आदेश फाइलों में कैद रह गया
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, 12 मार्च 2024 को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, मंत्रालय द्वारा नीलाराम पटेल का स्थानांतरण जिला पंचायत रायगढ़ से जिला पंचायत बीजापुर किया गया था। सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत किसी भी अधिकारी को निर्धारित समयसीमा में कार्यमुक्त होकर नई पदस्थापना स्थल पर कार्यभार ग्रहण करना होता है, लेकिन इस मामले में यह प्रक्रिया ठप नजर आती है।
लगातार निर्देश, फिर भी कार्रवाई शून्य
स्थानांतरण आदेश के पालन न होने पर शासन स्तर से एक के बाद एक निर्देश जारी किए गए।
– 29 अक्टूबर 2024 को तत्काल कार्यमुक्त करने का आदेश
– 27 नवंबर 2024 को रिमाइंडर
– 20 जनवरी 2025 को विकास आयुक्त कार्यालय द्वारा एकतरफा ज्वाइनिंग निर्देश
– 18 सितंबर 2025 को कारण बताओ नोटिस
– 26 नवंबर 2025 को पुनः आदेश पालन के निर्देश
इन सभी औपचारिकताओं के बावजूद अधिकारी का उसी पद पर बने रहना यह संकेत देता है कि या तो आदेशों को गंभीरता से नहीं लिया गया या फिर कहीं न कहीं प्रणालीगत शिथिलता मौजूद है।
वेतन पर भी सवाल, निर्देशों की अनदेखी?
सूत्रों के मुताबिक, सामान्य प्रशासन विभाग ने जनवरी 2026 में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि स्थानांतरण के बाद भी मूल पद पर जमे अधिकारियों का वेतन आहरित न किया जाए। इसके बावजूद यदि संबंधित अधिकारी का वेतन जारी रहा है, तो यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि वित्तीय अनुशासन से भी जुड़ जाता है।
एक ही जिले में लंबा कार्यकाल—नीति पर प्रश्न
नीलाराम पटेल का अधिकांश कार्यकाल रायगढ़ जिले में ही बीता है। वर्ष 2014 में सेवा में आने के बाद से वे लगभग पूरे समय जिले में विभिन्न पदों पर कार्यरत रहे। केवल सीमित अवधि के लिए वे डभरा क्षेत्र में पदस्थ रहे, जबकि बाकी समय रायगढ़ जिले में ही बिताया गया।
पुसौर, बरमकेला सहित विभिन्न पदस्थापनाओं के बाद वे पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से जिला पंचायत में उप संचालक पंचायत एवं अतिरिक्त सीईओ के रूप में कार्यरत हैं। स्थानीय निवासी होने के कारण भी उनकी निरंतर पदस्थापना को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
चुनाव जैसे संवेदनशील कार्य भी संभाले
सूत्र बताते हैं कि उनके कार्यकाल में विधानसभा, लोकसभा और पंचायत चुनाव जैसे महत्वपूर्ण निर्वाचन कार्य भी संपन्न कराए गए। ऐसे में स्थानीय स्तर पर लंबे समय तक पदस्थ रहने और चुनावी जिम्मेदारियों के संयोजन को लेकर निष्पक्षता पर भी चर्चा तेज हो गई है।
पूर्व अधिकारियों की भूमिका भी घेरे में
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि स्थानांतरण आदेश जारी होने के बाद तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ द्वारा उन्हें कार्यमुक्त नहीं किया गया। बाद में पदस्थ हुए अधिकारियों ने भी इस स्थिति को बरकरार रखा। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि आदेशों के अनुपालन में संस्थागत इच्छाशक्ति का अभाव रहा।
सवालों के घेरे में प्रशासनिक अनुशासन
सामान्यतः यदि कोई कर्मचारी स्थानांतरण आदेश का पालन नहीं करता, तो उसके खिलाफ त्वरित अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है। लेकिन यहां मंत्रालय, विकास आयुक्त कार्यालय और सामान्य प्रशासन विभाग के लगातार निर्देशों के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाना प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
राजनीतिक संरक्षण की चर्चा, लेकिन पुष्टि नहीं
प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि कहीं किसी प्रभावशाली राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण के कारण यह स्थिति बनी हुई है। हालांकि इस संबंध में अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सवाल लगातार उठ रहे हैं।
अधिकारियों के बयान
अपर विकास आयुक्त वी.पी. तिर्की का कहना है, “आदेश जारी किया गया था। प्रक्रिया क्यों पूरी नहीं हुई, इसकी समीक्षा की जाएगी। विधानसभा सत्र के बाद उचित कार्रवाई होगी।”
वहीं, जिला पंचायत सीईओ अभिजीत पठारे ने कहा, “यह मामला मेरे कार्यभार से पहले का है। वर्तमान स्थिति की जानकारी रिकॉर्ड देखने के बाद ही दी जा सकती है।”
मंत्री की चुप्पी पर भी उठे सवाल
रायगढ़ जिले से जुड़े इस मामले के सामने आने के बाद वित्त एवं वाणिज्यिक कर मंत्री ओपी चौधरी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष और स्थानीय स्तर पर यह पूछा जा रहा है कि इतने लंबे समय तक आदेशों के अनुपालन न होने पर जनप्रतिनिधियों ने क्या पहल की।
अब तक मंत्री की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
अब निगाहें शासन पर
लगातार आदेशों की अवहेलना के बाद अब यह देखना अहम होगा कि शासन इस मामले में जिम्मेदारी तय करता है या फिर यह प्रकरण भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा। यह मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही और पारदर्शिता की कसौटी बन चुका है।
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