सीएमओ चौक की चीख: कोयला ढोते बेलगाम ट्रेलर ने छीनी मासूम की जान, आखिर कब जागेगा सिस्टम?

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़। शहर के भगवानपुर स्थित सीएमओ चौक पर रविवार का दिन एक परिवार के लिए कभी न भरने वाला घाव बन गया। 14 वर्षीय ममता तिर्की की मौत केवल एक सड़क हादसा नहीं है, बल्कि उस लापरवाही की कीमत है, जो वर्षों से भारी वाहनों—खासकर कोयला लोड ट्रेलरों—के रूप में शहर की सड़कों पर दौड़ रही है।
ममता अपने दादा पितरोस तिर्की के साथ सरकारी राशन दुकान से चावल लेकर घर लौट रही थी। रोजमर्रा की यह सामान्य यात्रा अचानक मौत की भयावह कहानी में बदल गई, जब पीछे से आ रहे एक तेज रफ्तार ट्रेलर ने उनकी स्कूटी को कुचल दिया। टक्कर इतनी भीषण थी कि मासूम ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, जबकि उसके दादा गंभीर रूप से घायल होकर अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं।
घटना के बाद चालक का भागना और फिर पुलिस द्वारा घेराबंदी कर उसे पकड़ लेना—यह सब एक तयशुदा पटकथा जैसा लगता है, जो हर बड़े हादसे के बाद दोहराई जाती है। सवाल यह है कि हादसे के बाद की कार्रवाई ही क्यों, हादसे से पहले की रोकथाम क्यों नहीं?
रायगढ़, जो कोयला और औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन चुका है, वहां सड़कों पर भारी वाहनों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। कोयला परिवहन में लगे ट्रेलर दिन-रात शहर के भीतर और आसपास बिना किसी ठोस निगरानी के दौड़ते हैं। ओवरलोडिंग, तेज रफ्तार और यातायात नियमों की खुलेआम अनदेखी अब आम बात हो चुकी है। नतीजा—हर कुछ दिनों में एक नई दुर्घटना, एक नया शोक, और कुछ समय बाद फिर वही ढर्रा।
स्थानीय लोग लंबे समय से बाईपास सड़क, भारी वाहनों के लिए अलग रूट और सख्त निगरानी की मांग कर रहे हैं। लेकिन फाइलों में योजनाएं चलती रहती हैं और जमीन पर हालात जस के तस बने रहते हैं। प्रशासनिक बैठकों में सुरक्षा के दावे किए जाते हैं, मगर सड़क पर उतरते ही ये दावे खोखले नजर आते हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि स्कूल जाने वाले बच्चे, बुजुर्ग और आम नागरिक उन्हीं सड़कों पर अपनी जान जोखिम में डालकर चलने को मजबूर हैं, जहां सैकड़ों टन कोयला ढोते ट्रेलर बेखौफ दौड़ते हैं। क्या शहर की सड़कों को खनन परिवहन के हवाले कर दिया गया है? क्या आम आदमी की जान की कीमत अब इतनी कम हो गई है?
ममता तिर्की की मौत एक चेतावनी है—सिर्फ एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए। अगर अब भी शासन और प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो ऐसे हादसे खबर नहीं, बल्कि रोजमर्रा की त्रासदी बन जाएंगे।
अब जरूरत है कड़े फैसलों की—भारी वाहनों के लिए अलग मार्ग, शहर के भीतर गति सीमा का सख्ती से पालन, ओवरलोडिंग पर तत्काल कार्रवाई और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की। वरना हर अगली दुर्घटना के साथ यही सवाल फिर गूंजेगा—आखिर कब जागेगा सिस्टम?
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