तमनार के बाद अब घरघोड़ा–धरमजयगढ़ की बारी: दो नए कोल ब्लॉकों की नीलामी से बढ़ेगा असर, सवालों के घेरे में विकास का मॉडल

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़। कोयला अंचल की पहचान रखने वाला रायगढ़ जिला एक बार फिर बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ा है। तमनार क्षेत्र में पहले से जारी खनन गतिविधियों के बीच अब घरघोड़ा और धरमजयगढ़ भी उसी रास्ते पर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। केंद्र सरकार के कोयला मंत्रालय द्वारा हाल ही में घोषित नीलामी सूची में जिले के टेरम और चैनपुर कोल ब्लॉक शामिल किए गए हैं, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि खनन का दायरा अब और विस्तारित होने जा रहा है।
दरअसल, कोल ब्लॉक ऑक्शन के नए दौर में देशभर के 17 खदानों को शामिल किया गया है। इनमें से 11 खदानें पहली बार नीलामी के लिए लाई गई हैं, जबकि कुछ पुराने ब्लॉकों पर दोबारा बोली मंगाई गई है। इस सूची में रायगढ़ के टेरम (घरघोड़ा) और चैनपुर (धरमजयगढ़) ब्लॉक का शामिल होना स्थानीय स्तर पर नई हलचल पैदा कर रहा है।
टेरम कोल ब्लॉक करीब 9.95 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और यहां से प्रतिवर्ष लगभग 8 मिलियन टन कोयला उत्पादन का अनुमान है। वहीं चैनपुर ब्लॉक का क्षेत्रफल 15.80 वर्ग किलोमीटर है, जो कोरबा जिले की सीमा से सटा हुआ है। खास बात यह है कि यह इलाका लेमरू एलीफेंट रिजर्व के नजदीक आता है, जिससे पर्यावरणीय चिंताएं भी गहराने लगी हैं।
पिछले कुछ वर्षों में तमनार क्षेत्र में खनन और औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार ने स्थानीय जीवन, जल स्रोतों और वन क्षेत्रों पर गहरा असर डाला है। अब वही तस्वीर घरघोड़ा और धरमजयगढ़ में दोहराए जाने की आशंका जताई जा रही है। ग्रामीणों के बीच यह चर्चा तेज है कि खनन परियोजनाओं के साथ आने वाले विस्थापन, रोजगार के वादे और पर्यावरणीय नुकसान का संतुलन आखिर किसके पक्ष में झुकेगा।
सरकार का तर्क है कि बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयला उत्पादन बढ़ाना जरूरी है और निजी कंपनियों की भागीदारी से यह लक्ष्य तेजी से हासिल किया जा सकता है। यही वजह है कि कोल ब्लॉकों के आवंटन में निजी क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ रही है। लेकिन जमीनी हकीकत यह भी है कि खनन प्रभावित क्षेत्रों में अब तक के अनुभव मिश्रित रहे हैं—कहीं रोजगार के अवसर बढ़े तो कहीं पारंपरिक आजीविका पर संकट गहराया।
घरघोड़ा और धरमजयगढ़ के इन नए ब्लॉकों की नीलामी केवल आर्थिक गतिविधि भर नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में सामाजिक और पर्यावरणीय बदलावों की भी दस्तक है। सवाल यह नहीं कि खनन होगा या नहीं—सवाल यह है कि इसके साथ जुड़े समुदायों को न्याय, पारदर्शिता और टिकाऊ विकास कितना मिल पाएगा।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन और कंपनियां स्थानीय लोगों के विश्वास को कैसे हासिल करती हैं और क्या इस बार विकास का मॉडल वास्तव में संतुलित और संवेदनशील साबित हो पाता है या नहीं।
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