रायगढ़ की शिक्षा पर बड़ा सवाल: पांच साल में आधे रह गए छात्र, 9 हजार से अधिक बच्चे स्कूलों से बाहर

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़, 3 अगस्त 2026।
जिले की स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। महज पांच वर्षों के भीतर स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या लगभग आधी रह जाना न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह शिक्षा तंत्र की जमीनी हकीकत भी उजागर करता है। वर्ष 2021-22 से 2025-26 तक के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि करीब 9 हजार से अधिक बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़कर स्कूलों से बाहर हो गए।
यदि कक्षा 8वीं से 12वीं तक का क्रमवार अध्ययन किया जाए तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। वर्ष 2021-22 में जिले के सरकारी और निजी स्कूलों में कक्षा 8वीं में कुल 19,852 विद्यार्थी दर्ज थे। यही बैच अगले वर्षों में क्रमशः 9वीं, 10वीं, 11वीं और 12वीं में पहुंचना था। लेकिन 2022-23 में 9वीं में यह संख्या घटकर 17,767 रह गई, 2023-24 में 10वीं में 15,363, 2024-25 में 11वीं में 11,543 और अंततः 2025-26 में 12वीं में केवल 10,717 विद्यार्थी ही शेष रह गए।
स्पष्ट है कि शुरुआती 19,852 विद्यार्थियों में से 9,135 बच्चे बीच रास्ते में ही शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो गए। यह गिरावट सामान्य नहीं मानी जा सकती और इसे ‘ड्रॉपआउट’ की श्रेणी में रखा जाता है।
सरकारी स्कूलों में अधिक गिरावट
आंकड़ों के अनुसार, सबसे ज्यादा असर सरकारी स्कूलों में देखने को मिला है। अनुमानित रूप से 2021-22 में जहां करीब 13 हजार विद्यार्थी सरकारी स्कूलों में थे, वहीं 2025-26 में 12वीं तक आते-आते यह संख्या घटकर 7,249 रह गई। दूसरी ओर निजी स्कूलों में भी लगभग 3 हजार छात्रों की कमी दर्ज की गई है। यह प्रवृत्ति बताती है कि आर्थिक और शैक्षणिक दोनों स्तरों पर चुनौतियां बनी हुई हैं।
कारण क्या हैं?
शिक्षा विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों के अनुसार, ड्रॉपआउट के पीछे कई कारण हैं। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी, कक्षाओं का नियमित संचालन न होना, गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई का अभाव और कमजोर निगरानी तंत्र प्रमुख वजहें मानी जा रही हैं। कई मामलों में बच्चे पारिवारिक जिम्मेदारियों या आर्थिक दबाव के चलते पढ़ाई छोड़ देते हैं, जबकि कुछ छात्र बार-बार असफल होने के कारण शिक्षा से दूरी बना लेते हैं।
धरमजयगढ़ जैसे सुदूर अंचलों में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण बताई जाती है, जहां बुनियादी संसाधनों के बावजूद गुणवत्तापूर्ण शिक्षण वातावरण का अभाव है। ऐसे में प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं—जैसे आईआईटी या आईआईएम—की तैयारी की बात करना भी दूर की कौड़ी प्रतीत होता है।
नीतियों और प्राथमिकताओं पर उठते सवाल
शिक्षा व्यवस्था में भवन, गणवेश और मध्याह्न भोजन जैसी सुविधाओं पर ध्यान तो दिया जा रहा है, लेकिन पर्याप्त और योग्य शिक्षकों की नियुक्ति एवं शैक्षणिक गुणवत्ता पर अपेक्षित फोकस नहीं दिख रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कक्षा में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक ड्रॉपआउट की समस्या पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है।
वापसी की कोशिश, लेकिन चुनौती बरकरार
शिक्षा विभाग द्वारा ड्रॉपआउट बच्चों को पुनः स्कूल से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन प्रयासों की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। केवल नामांकन बढ़ाने के बजाय शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और नियमित मॉनिटरिंग को प्राथमिकता देने की जरूरत है।
रायगढ़ के ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि उस भविष्य की चेतावनी हैं जो शिक्षा से दूर हो रहा है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह गिरावट आने वाले वर्षों में सामाजिक और आर्थिक असंतुलन का कारण बन सकती है।
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