राजधानी में इमरजेंसी सिस्टम फेल: 11 कॉल के बाद भी नहीं पहुंची एंबुलेंस, मालवाहक से एम्स ले जाए गए युवक ने तोड़ा दम

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इमरजेंसी स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत एक बार फिर सवालों के घेरे में है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जरूरत के वक्त एंबुलेंस न मिल पाने की वजह से एक 20 वर्षीय युवक की जान चली गई। यह घटना न सिर्फ सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है, बल्कि आम नागरिकों की सुरक्षा और भरोसे को भी झकझोरती है।
मामला बोरियाखुर्द इलाके का है, जहां शनिवार रात करीब 8 बजे प्रवीण कुमार (20) की अचानक तबीयत बिगड़ गई। परिजनों के अनुसार, युवक के पूरे शरीर में तेज दर्द होने लगा और उसकी हालत तेजी से बिगड़ती चली गई। परिजनों ने तत्काल एंबुलेंस के लिए 108 नंबर डायल किया, लेकिन कॉल 112 सेवा में ट्रांसफर हो गया। वहां से एंबुलेंस भेजने का आश्वासन तो मिला, लेकिन हकीकत में मदद समय पर नहीं पहुंची।
आधे घंटे में 11 बार कॉल, फिर भी नहीं मिली मदद
परिजन लक्ष्मी नारायण नागरची ने बताया कि रात 8 बजे से 8:30 बजे के बीच उन्होंने कुल 11 बार एंबुलेंस सेवा से संपर्क किया। हर बार यही जवाब मिला कि एंबुलेंस भेजी जा रही है, लेकिन मौके पर कोई वाहन नहीं पहुंचा। समय बीतने के साथ मरीज की हालत और गंभीर होती गई।
मजबूरी में मालवाहक बना सहारा
स्थिति बिगड़ती देख परिजनों ने पहले स्कूटी से अस्पताल ले जाने की कोशिश की, लेकिन दर्द के कारण युवक बैठ नहीं सका। आखिरकार मजबूरी में एक मालवाहक वाहन का सहारा लेना पड़ा और उसी में उसे एम्स रायपुर पहुंचाया गया। हालांकि तब तक काफी देर हो चुकी थी। इलाज के दौरान रविवार सुबह करीब 9:30 बजे युवक ने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों के मुताबिक, उसके फेफड़ों में गंभीर संक्रमण था।
हर साल 500 करोड़ खर्च, फिर भी सिस्टम लाचार
प्रदेश में डायल 112 के जरिए एंबुलेंस, फायर और पुलिस जैसी आपात सेवाएं संचालित की जाती हैं, जिन पर हर साल 500 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होते हैं। इसके बावजूद राजधानी जैसे शहरी क्षेत्र में भी समय पर एंबुलेंस उपलब्ध न होना गंभीर चिंता का विषय है। इस सेवा के संचालन की जिम्मेदारी निजी एजेंसी जीवीके को सौंपी गई है।
जवाबदेही पर खामोशी
इस मामले में जब डायल 112 के जिम्मेदार अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। इससे जवाबदेही को लेकर और भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता की कहानी है। सवाल यह है कि जब राजधानी में ही आपात सेवाएं समय पर नहीं पहुंच पा रही हैं, तो दूरदराज के इलाकों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
अब देखना होगा कि इस मामले में प्रशासन क्या कार्रवाई करता है और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
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