बजरमुड़ा भू-अर्जन घोटाला: 84 करोड़ का हिसाब, 300 करोड़ का भुगतान… जांच के बाद भी कार्रवाई ठंडी, आखिर किसके दबाव में सुशासन?

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़।
प्रदेश के औद्योगिक हृदय माने जाने वाले रायगढ़ जिले में बजरमुड़ा भू-अर्जन प्रकरण अब केवल एक अनियमितता नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है। दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों से सामने आए तथ्यों ने यह संकेत दिया है कि जिस भूमि के लिए वास्तविक मुआवजा लगभग 84 करोड़ रुपये बैठता है, वहां प्रारंभिक अवार्ड के तहत करीब 300 करोड़ रुपये तक का भुगतान कर दिया गया। इस भारी अंतर ने पूरे मामले को प्रदेश के सबसे चर्चित घोटालों में शामिल कर दिया है।
मामला गारे पेलमा सेक्टर-3 कोल ब्लॉक से जुड़ा है, जहां छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जेनरेशन कंपनी (CSPGCL) के लिए भू-अर्जन किया गया था। वर्ष 2020 में प्रारंभिक अधिसूचना जारी होने के बाद 22 जनवरी 2021 को अवार्ड पारित हुआ और केवल बजरमुड़ा क्षेत्र की 170 हेक्टेयर भूमि पर ही 415 करोड़ से अधिक का मुआवजा स्वीकृत कर दिया गया।
हालांकि, बाद में राज्य स्तरीय जांच में कई गंभीर विसंगतियां उजागर हुईं—असिंचित भूमि को सिंचित दर्शाना, पेड़ों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर बताना, टिन शेड को पक्के निर्माण के रूप में दिखाना, तथा कुएं, बरामदे और पोल्ट्री फार्म जैसी परिसंपत्तियों का मनमाना मूल्यांकन। जांच में यह भी सामने आया कि परिसंपत्तियों के आकलन में सबसे अधिक गड़बड़ी की गई, जिससे सरकारी कंपनी को करोड़ों का नुकसान हुआ।
पुनः सर्वे में खुली परतें
घोटाला सामने आने के बाद पुनः सर्वे का आदेश दिया गया। 19 दिसंबर 2024 को प्रस्तुत रिपोर्ट में केवल 108 हेक्टेयर भूमि का पुनर्मूल्यांकन किया गया, जिसमें मुआवजा करीब 84 करोड़ रुपये ही आंका गया। यह आंकड़ा पहले किए गए भुगतान से बेहद कम है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि प्रारंभिक प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता हुई। अभी भी लगभग 62 हेक्टेयर भूमि का सर्वे शेष है, जिसके बाद नुकसान का वास्तविक आकलन और स्पष्ट हो सकता है।
जांच जारी, पर कार्रवाई अधर में
प्रकरण को आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) और एसीबी को सौंपा गया है, लेकिन जांच की गति पर सवाल उठ रहे हैं। राज्य स्तरीय जांच में दोषियों के खिलाफ अपराध दर्ज करने के निर्देश दिए जाने के बावजूद अब तक निर्णायक कार्रवाई नहीं हो पाई है।
इस बीच, सबसे गंभीर पहलू यह सामने आया है कि जांच के बाद भी विवादित भूमि पर कंपनी को भू-प्रवेश (माइनिंग) की अनुमति दे दी गई। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संभावित सबूतों के नष्ट होने का खतरा बढ़ गया है।
कई अधिकारी जांच के दायरे में
इस प्रकरण में तत्कालीन एसडीएम को निलंबित किया जा चुका है, जबकि तहसीलदार, आरआई, उद्यानिकी विभाग, पीएचई, पीडब्ल्यूडी और वन विभाग के कई अधिकारी भी जांच के घेरे में हैं। आरोप है कि राजस्व और तकनीकी आकलन से जुड़े इन अधिकारियों की भूमिका के बिना इतने बड़े स्तर पर अनियमितता संभव नहीं थी।
बड़ा सवाल: जवाबदेही कब तय होगी?
बजरमुड़ा प्रकरण केवल आर्थिक नुकसान का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता और शासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है। जब जांच में गड़बड़ी प्रमाणित हो चुकी है और मुआवजे में भारी अंतर सामने आ चुका है, तब भी कार्रवाई में देरी आमजन के बीच अविश्वास को बढ़ा रही है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या जांच एजेंसियां इस प्रकरण को अंजाम तक पहुंचा पाएंगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
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