जिंदा बेटी का श्राद्ध: रिश्तों के ‘मौत’ की घोषणा

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
कोलकाता। उत्तर दिनाजपुर जिले के चोपड़ा थाना क्षेत्र के सोनापुर के जुआखुरी अग्निबाड़ी गांव से सामने आई एक घटना ने समाज को भीतर तक झकझोर दिया है। यहां एक परिवार ने अपनी ही जीवित बेटी का विधिवत श्राद्ध कर उसे ‘मृत’ घोषित कर दिया। यह केवल एक पारिवारिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक मान्यताओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के टकराव की एक भयावह तस्वीर बनकर उभरा है।
बताया जा रहा है कि युवती ने अपने ही गांव के एक युवक से प्रेम विवाह कर लिया था। परिवार की सहमति के बिना उठाया गया यह कदम उसके माता-पिता को इतना नागवार गुजरा कि उन्होंने उसे वापस लाने की हर कोशिश की। समझाइश, दबाव और सामाजिक प्रतिष्ठा के हवाले—सब कुछ आजमाया गया, लेकिन जब बेटी अपने फैसले से पीछे नहीं हटी, तो परिजनों ने एक ऐसा रास्ता चुना जिसने मानवीय संवेदनाओं को कठघरे में खड़ा कर दिया।
शनिवार को घर के आंगन में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से श्राद्ध कर्म संपन्न किया गया। पिंडदान से लेकर तर्पण तक की सभी रस्में उसी गंभीरता से निभाई गईं, जैसे किसी मृतक के लिए की जाती हैं। परिवार के सदस्य रोते-बिलखते नजर आए—लेकिन यह शोक किसी मृत्यु का नहीं, बल्कि एक जीवित रिश्ते को समाप्त करने का था।
ग्रामीणों के मुताबिक, इस कदम को ‘उदाहरण’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, ताकि गांव की अन्य लड़कियां परिवार की इच्छा के विरुद्ध कोई फैसला लेने से पहले सौ बार सोचें। हालांकि, यह तर्क अपने साथ यह सवाल भी खड़े करता है—क्या सामाजिक अनुशासन के नाम पर किसी व्यक्ति के अस्तित्व को नकार देना उचित है!
हिंदू परंपरा में श्राद्ध को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का संस्कार माना जाता है, लेकिन किसी जीवित व्यक्ति के लिए इसे करना सामाजिक बहिष्कार का चरम रूप माना जाता है। यह घटना बताती है कि आधुनिक कानून भले ही बालिगों को अपने जीवन के फैसले लेने की स्वतंत्रता देता हो, लेकिन जमीनी हकीकत में पारिवारिक और सामाजिक दबाव अब भी उतने ही मजबूत हैं।
फिलहाल, गांव में सन्नाटा है, लेकिन यह सन्नाटा कई अनकहे सवालों से भरा हुआ है। यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का आईना है, जिसमें ‘इज्जत’ के नाम पर रिश्तों की सांसें घुट जाती हैं।