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गढ़ा-मंडला के कुंवर सिंह मरावी को मध्यप्रदेश गोंडवाना गोंड महासभा की कमान, दुर्ग में संगठन विस्तार और सांस्कृतिक पहचान पर मंथन

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राष्ट्रीय गोंडवाना गोंड महासभा की बैठक में सदस्यता अभियान, पारंपरिक देव व्यवस्था और आगामी जनगणना में आदिवासी समुदायों की पहचान दर्ज कराने पर हुई चर्चा

दुर्ग, 25 अक्टूबर। गोंडवाना की ऐतिहासिक विरासत, आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और संगठनात्मक एकजुटता को लेकर छत्तीसगढ़ के दुर्ग स्थित गोंडवाना सामुदायिक भवन में 24 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रीय गोंडवाना गोंड महासभा भारत की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। राष्ट्रीय अध्यक्ष तिरू. आर.सी. नेताम की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में गोंडवाना गोंड महासभा मध्यप्रदेश के प्रदेशाध्यक्ष पद पर गोंडवाना की ऐतिहासिक राजधानी गढ़ा-मंडला के तिरू. कुंवर सिंह मरावी को सर्वसम्मति से चुना गया।

बैठक में संगठन के विस्तार, सदस्यता अभियान को गति देने, विभिन्न राज्यों में महासभा की गतिविधियों की समीक्षा, पारंपरिक गोंडवाना संस्कृति के संरक्षण और आगामी जनगणना में आदिवासी समुदायों की पहचान को लेकर विस्तार से चर्चा हुई। विभिन्न राज्यों से पहुंचे पदाधिकारियों और समाज के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखते हुए संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

सर्वसम्मति से कुंवर सिंह मरावी को मिली प्रदेशाध्यक्ष की जिम्मेदारी

बैठक का प्रमुख घटनाक्रम मध्यप्रदेश में संगठन के नेतृत्व को लेकर रहा। गढ़ा-मंडला क्षेत्र के तिरू. कुंवर सिंह मरावी को सर्वसम्मति से मध्यप्रदेश गोंडवाना गोंड महासभा का प्रदेशाध्यक्ष चुना गया। इस चयन को संगठन की प्रदेशस्तरीय गतिविधियों को दिशा देने और समाज के बीच उसकी पहुंच मजबूत करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हालांकि, प्रदेशाध्यक्ष के रूप में नई जिम्मेदारी मिलने के बाद संगठन की आगामी कार्ययोजना, सदस्यता विस्तार और क्षेत्रीय इकाइयों की सक्रियता किस तरह आगे बढ़ेगी, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।

बड़ा देव की पूजा के साथ शुरू हुआ कार्यक्रम

बैठक की शुरुआत गोंडी रीति-रिवाज और परंपराओं के अनुरूप बड़ा देव एवं प्रकृति शक्ति की पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके बाद उपस्थित पदाधिकारियों और सदस्यों ने एक-दूसरे से परिचय प्राप्त किया। कार्यक्रम का संचालन तिरू. सिदार ने किया।

बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष तिरू. आर.सी. नेताम के साथ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तिरू. अजीत सिंह मरावी, राष्ट्रीय सलाहकार शोभित राम नेताम, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तिरू. मुरलीधर टेकाम और युवा प्रभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष कंदर्प राज सिदार सहित विभिन्न पदाधिकारी उपस्थित रहे।

बैठक में संगठनात्मक गतिविधियों की समीक्षा के साथ यह विचार प्रमुखता से सामने आया कि समाज की एकजुटता केवल केंद्रीय या प्रदेशस्तरीय बैठकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि गांव, क्षेत्र और स्थानीय सामाजिक इकाइयों तक संगठन की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए।

राज्यों में संगठन की स्थिति की समीक्षा, सदस्यता अभियान पर जोर

बैठक के दौरान पिछली बैठक में विभिन्न राज्यों के लिए सौंपे गए प्रभारों की समीक्षा की गई। संबंधित प्रभारियों द्वारा महासभा के लिए किए गए कार्यों और संगठनात्मक गतिविधियों की प्रगति पर चर्चा हुई।

सदस्यता अभियान को लेकर विशेष रूप से विचार-विमर्श किया गया। उपस्थित पदाधिकारियों ने विभिन्न प्रदेशों में सदस्यता अभियान शुरू करने और समाज के अधिक से अधिक लोगों को संगठन से जोड़ने पर सहमति जताई।

इसके साथ ही संगठनात्मक ढांचे को मजबूत बनाने तथा निचले स्तर की इकाइयों के विस्तार पर भी चर्चा हुई। पदाधिकारियों और सदस्यों ने अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं, सामाजिक चुनौतियों और संगठन के सामने मौजूद प्राथमिकताओं को बैठक में रखा।

बैठक में यह आवश्यकता रेखांकित की गई कि संगठन की मजबूती के लिए नियमित संपर्क, जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण और स्थानीय स्तर पर सक्रिय इकाइयों का गठन महत्वपूर्ण है।

52 गणों और 57 परगनाओं की ऐतिहासिक व्यवस्था पर चर्चा

राष्ट्रीय अध्यक्ष तिरू. आर.सी. नेताम ने अपने संबोधन में गोंडवाना की ऐतिहासिक परंपराओं, पूर्वजों की शासन व्यवस्था और पारंपरिक सामाजिक संरचना के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

उन्होंने 52 गणों और 57 परगनाओं की व्यवस्था का उल्लेख करते हुए बताया कि पूर्वजों के समय विभिन्न गणों के बीच संपर्क, आवागमन और आपसी संबंध किस प्रकार कायम रहते थे। उन्होंने पारंपरिक क्षेत्रों के रास्तों, सामाजिक संपर्क व्यवस्था और अपने अधिकार क्षेत्र की रक्षा के लिए पूर्वजों द्वारा किए गए संघर्षों के संदर्भ में भी जानकारी साझा की।

उनके संबोधन में संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज और गोंडवाना के पारंपरिक गणों के संरक्षण का विषय प्रमुख रहा। उन्होंने इन परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और समाज के लोगों को अपनी ऐतिहासिक विरासत से परिचित कराने की आवश्यकता पर जोर दिया।

बैठक में इस विषय पर भी विचार हुआ कि ऐतिहासिक परंपराओं की जानकारी केवल मौखिक स्मृतियों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के युवाओं को भी उनके बारे में व्यवस्थित रूप से जागरूक किया जाए।

जन्म से मृत्यु तक की परंपराओं और देव-संगा व्यवस्था पर विमर्श

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तिरू. अजीत सिंह मरावी ने गोंड समाज की पारंपरिक जीवन पद्धति और देव-संगा व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी।

उन्होंने जन्म, विवाह और मृत्यु से जुड़ी परंपराओं के साथ एक देव-संगा से लेकर सात देव-संगा तक की व्यवस्था का उल्लेख किया। गोत्र व्यवस्था, संगा परंपरा और अलग-अलग पगड़ी के उपयोग से जुड़े विषयों पर भी चर्चा की गई।

उन्होंने बताया कि पारंपरिक प्रतीकों, रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्थाओं के पीछे मौजूद मान्यताओं को समझना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत को पहचान सकें।

सतरंगी झंडे में प्रयुक्त सात रंगों और गढ़ अथवा देव व्यवस्था के बीच पारंपरिक संबंधों को लेकर भी उन्होंने अपनी बात रखी। इस दौरान पारंपरिक व्यवस्थाओं की जानकारी समाज के युवाओं और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

बैठक में देव-संगा व्यवस्था को सामाजिक पहचान, पारंपरिक मान्यताओं और सांस्कृतिक निरंतरता से जोड़कर देखा गया।

आगामी जनगणना में आदिवासी पहचान दर्ज कराने की अपील

बैठक के दौरान वर्ष 2027 में प्रस्तावित जनगणना को लेकर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई। तिरू. अजीत सिंह मरावी ने आदिवासी समुदायों की पहचान और जनगणना में उनकी प्रविष्टि से जुड़े विषय को उठाया।

उन्होंने उपस्थित पदाधिकारियों से आग्रह किया कि वे अपने-अपने प्रदेशों और क्षेत्रों में जनजागरण अभियान चलाएं, ताकि जनगणना के दौरान लोग अपनी वास्तविक सामाजिक, सामुदायिक और धार्मिक पहचान से संबंधित जानकारी समझ सकें।

उन्होंने ‘ट्राइबल’ अथवा ‘आदिवासी’ के उल्लेख के साथ गोंड, भील, कोयापुनेम, सरना सहित विभिन्न समुदायों की पहचान को सामने रखने की बात कही। बैठक में आदिवासी समुदायों की उपजातियों और उनकी पहचान से संबंधित विषयों पर भी चर्चा हुई।

उपस्थित पदाधिकारियों ने इस मुद्दे पर अपने क्षेत्रों में प्रचार-प्रसार और जागरूकता बढ़ाने के प्रस्ताव पर सहमति जताई।

हालांकि, जनगणना में धर्म, जाति अथवा समुदाय के नाम दर्ज करने की वास्तविक प्रक्रिया और उपलब्ध विकल्प संबंधित आधिकारिक दिशा-निर्देशों के अनुसार ही निर्धारित होंगे। इसलिए इस विषय पर जनजागरण के साथ-साथ सरकारी अधिसूचनाओं और जनगणना प्राधिकरण के निर्देशों की जानकारी लोगों तक पहुंचाना भी आवश्यक होगा।

एक से सात देव-संगा समुदायों की व्यवस्था पर कमलेश धुर्व ने रखे विचार

बैठक के समापन से लगभग आधे घंटे पहले सर्व आदिवासी कोर कमेटी के सदस्य, गोंडवाना महासभा के राष्ट्रीय सदस्य, छत्तीसगढ़ के अधिकारी-कर्मचारी तथा धमधा गढ़ के अध्यक्ष और समाजसेवी तिरू. कमलेश धुर्व ने उपस्थित लोगों को संबोधित किया।

उन्होंने एक देव, दो देव, तीन देव, चार देव, पांच देव, छह देव और सात देव-संगा समुदायों की गढ़ अथवा देव व्यवस्था के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने पारंपरिक व्यवस्थाओं की समझ विकसित करने और उन्हें सामाजिक स्तर पर मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

उनके संबोधन में इस बात पर जोर रहा कि परंपराओं का संरक्षण तभी प्रभावी हो सकता है, जब समाज के लोग उनके महत्व को समझें और नई पीढ़ी तक उनका ज्ञान पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाएं।

बैठक के दौरान उपस्थित सदस्यों ने भी अपने विचार रखे और सामाजिक संगठन को मजबूत बनाने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।

विभिन्न राज्यों के पदाधिकारियों की रही उपस्थिति

कार्यक्रम में राष्ट्रीय सचिव तिरू. पन्ना लाल नेताम, ज्वाइंट सेक्रेटरी तिरू. सुश्री माधुरी मरकाम, तिरू. कमल नेताम, तिरू. बाबूलाल उइके और महाराष्ट्र के युवा अध्यक्ष तिरू. रामकृष्ण टेकाम सहित विभिन्न राज्यों और छत्तीसगढ़ से आए पदाधिकारी, समाज प्रमुख तथा सदस्य उपस्थित रहे।

बैठक में संगठन के विस्तार, सदस्यता अभियान, सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और स्थानीय स्तर पर सामाजिक जागरूकता बढ़ाने जैसे विषयों पर चर्चा के बाद कार्यक्रम का समापन हुआ।

अंत में राष्ट्रीय अध्यक्ष तिरू. आर.सी. नेताम ने उपस्थित पदाधिकारियों, सदस्यों और समाज के प्रतिनिधियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

संगठन के सामने अब जिम्मेदारियों को जमीन पर उतारने की चुनौती

दुर्ग में आयोजित इस बैठक में नेतृत्व चयन के साथ संगठनात्मक और सांस्कृतिक विषयों को प्रमुखता मिली। मध्यप्रदेश के प्रदेशाध्यक्ष पद पर कुंवर सिंह मरावी का सर्वसम्मति से चयन, विभिन्न राज्यों में सदस्यता अभियान शुरू करने की सहमति और पारंपरिक व्यवस्थाओं पर हुई चर्चा बैठक के प्रमुख बिंदु रहे।

अब इन प्रस्तावों को व्यावहारिक रूप देने, प्रदेश और स्थानीय इकाइयों को सक्रिय करने तथा समाज के बीच नियमित संवाद स्थापित करने की जिम्मेदारी संगठन के पदाधिकारियों पर होगी। सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और नई पीढ़ी को उससे जोड़ने के प्रयास कितने प्रभावी होते हैं, यह आगामी गतिविधियों और संगठन की जमीनी पहल से सामने आएगा।

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