जगतू महरा की ऐतिहासिक विरासत को सम्मान दिलाने की पहल, ST सूची में शामिल करने से लेकर मुरिया दरबार में प्रतिनिधित्व तक उठीं मांगें

संयुक्त महरा/माहरा समाज ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन में रखे चार प्रमुख मुद्दे; जगदलपुर के प्रवेश द्वार पर प्रतिमा स्थापना और ऐतिहासिक योगदान को सरकारी अभिलेखों में दर्ज करने का भी आग्रह
जगदलपुर। बस्तर की ऐतिहासिक विरासत, जनजातीय पहचान और सांस्कृतिक परंपराओं में अपने योगदान को उचित मान्यता दिलाने के लिए संयुक्त महरा/माहरा समाज ने आवाज बुलंद की है। समाज ने महरा/माहरा जाति को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल करने, बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में प्रतिनिधित्व देने और जगदलपुर के ऐतिहासिक विकास में जगतू महरा के योगदान को सम्मानित करने की मांग उठाई है। इन मांगों को लेकर 23 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन तैयार किया गया है।
समाज की ओर से रखी गई मांगें केवल जातिगत पहचान तक सीमित नहीं हैं। इनमें ऐतिहासिक दस्तावेजों की जांच, सांस्कृतिक परंपराओं में भागीदारी, सार्वजनिक स्थलों पर ऐतिहासिक व्यक्तित्व को सम्मान देने और समाज के योगदान को अभिलेखों में स्थान दिलाने जैसे विषय भी शामिल हैं।
अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की मांग, पुराने दस्तावेजों का दिया हवाला
ज्ञापन में संयुक्त महरा/माहरा समाज ने दावा किया है कि समुदाय का बस्तर के इतिहास, संस्कृति और परंपराओं से पुराना संबंध रहा है। समाज का कहना है कि वर्ष 1949-50 के संवैधानिक अभिलेखों और राजपत्र संबंधी दस्तावेजों में महरा/माहरा जाति का उल्लेख अनुसूचित जनजाति के रूप में मिलता है।
इन्हीं कथित ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए समाज ने समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में पुनः शामिल करने की मांग की है।
हालांकि, इस दावे की संवैधानिक स्थिति का निर्धारण संबंधित सरकारी अभिलेखों और लागू अधिसूचनाओं के परीक्षण से ही किया जा सकता है। अनुसूचित जनजातियों की सूची में किसी समुदाय को शामिल करने या उसमें संशोधन की प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के तहत संचालित होती है। इसलिए समाज की मांग और उस पर होने वाली आधिकारिक कार्रवाई के बीच अंतर समझना जरूरी है।
जगदलपुर के इतिहास में जगतू महरा की भूमिका को दर्ज करने की मांग
समाज ने जगदलपुर के ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में जगतू महरा के योगदान का उल्लेख करते हुए उनके व्यक्तित्व और भूमिका को उचित सम्मान देने की मांग की है।
ज्ञापन में आग्रह किया गया है कि बस्तर के इतिहास, सांस्कृतिक परंपराओं और आदिवासी विकास से जुड़े अभिलेखों में महरा/माहरा समुदाय के योगदान को प्रमुखता से स्थान दिया जाए।
यह मांग इतिहास के दस्तावेजीकरण और स्थानीय विरासत के संरक्षण से भी जुड़ती है। समाज का मानना है कि यदि किसी समुदाय का क्षेत्र के सामाजिक और ऐतिहासिक विकास में योगदान रहा है, तो उसे सरकारी अभिलेखों तथा सार्वजनिक स्मृतियों में उचित स्थान मिलना चाहिए।
हालांकि, जगतू महरा की ऐतिहासिक भूमिका और जगदलपुर के नामकरण से संबंधित दावों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों, स्थानीय अभिलेखों और प्रामाणिक स्रोतों का परीक्षण आवश्यक होगा।
मुरिया दरबार में प्रतिनिधित्व का आग्रह
बस्तर दशहरा क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। इस आयोजन से जुड़ी परंपराएं बस्तर की सामाजिक संरचना और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को दर्शाती हैं।
संयुक्त महरा/माहरा समाज ने इसी सांस्कृतिक संदर्भ में मुरिया दरबार में अपने प्रतिनिधि को शामिल किए जाने की मांग रखी है। समाज का कहना है कि बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े समुदायों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
मुरिया दरबार में प्रतिनिधित्व की यह मांग अब प्रशासन के सामने एक ऐसे विषय के रूप में रखी गई है, जिस पर परंपराओं, ऐतिहासिक संदर्भों और वर्तमान व्यवस्था को ध्यान में रखकर विचार किया जा सकता है।
शहर के प्रवेश द्वार पर जगतू महरा की प्रतिमा लगाने की मांग
ज्ञापन में जगतू महरा की स्मृति को सार्वजनिक पहचान देने के लिए जगदलपुर शहर के मुख्य प्रवेश द्वार अथवा किसी प्रमुख सार्वजनिक स्थल पर उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित करने का आग्रह भी किया गया है।
समाज ने मुख्य प्रवेश द्वार का नामकरण उनके नाम पर किए जाने की मांग रखी है। इसके अतिरिक्त, बस्तर दशहरा के दौरान अस्थायी पुलिस कैंप लगाए जाने वाले स्थल पर 20×20 फीट भूमि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है, ताकि वहां प्रतिमा स्थापित की जा सके।
इन मांगों के पीछे समाज का उद्देश्य जगतू महरा की स्मृति को संरक्षित करना और आने वाली पीढ़ियों तक उनके योगदान को पहुंचाना बताया गया है।
अब शासन-प्रशासन की भूमिका पर टिकी नजरें
संयुक्त महरा/माहरा समाज ने शासन-प्रशासन से मांगों पर गंभीरता से विचार करने, ऐतिहासिक तथ्यों की जांच कराने और समुदाय को उचित सम्मान दिलाने के लिए आवश्यक पहल करने की अपील की है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार, समाज ने अपनी मांगें राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन के माध्यम से रखी हैं। ज्ञापन पर संबंधित कार्यालय की क्या कार्रवाई होती है, क्या ऐतिहासिक दस्तावेजों की आधिकारिक जांच कराई जाती है और प्रतिनिधित्व तथा प्रतिमा स्थापना जैसे प्रस्तावों पर प्रशासन क्या निर्णय लेता है—इन सवालों के जवाब आगे की प्रक्रिया से स्पष्ट होंगे।
समाज की मांगों का वास्तविक परिणाम आधिकारिक दस्तावेजों की जांच और शासन-प्रशासन के निर्णय पर निर्भर करेगा। अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किए जाने का प्रश्न संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा है, जबकि ऐतिहासिक सम्मान और सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व की मांगों पर संबंधित प्राधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र एवं प्रचलित नियमों के अनुसार विचार कर सकते हैं।
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