कोल ब्लॉकों की चमक के पीछे छिपा ‘पट्टा खेल’: धर्मजयगढ़ में मुआवजे की दौड़ और जमीन की सच्चाई

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
धर्मजयगढ़–रायगढ़ और कोरबा के मांड क्षेत्र में कोयले की अपार संपदा वर्षों से जमीन के नीचे दबी थी, लेकिन अब वह तेजी से देश की ऊर्जा जरूरतों का आधार बनने जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा निजी और सरकारी कंपनियों को किए गए आवंटन के बाद यहां उत्खनन की गतिविधियां तेज हो चुकी हैं। कुछ खदानें चालू हो चुकी हैं, जबकि कई परियोजनाएं अंतिम तैयारियों में हैं। परंतु विकास की इस रफ्तार के समानांतर एक गंभीर सवाल भी खड़ा हो रहा है—क्या जमीन का मुआवजा सही हाथों तक पहुंचेगा?
यहीं से कहानी जटिल होती है।
धर्मजयगढ़ तहसील का वह इलाका, जहां 1960 से 1980 के दशक के बीच विस्थापितों—खासतौर पर बंगाली शरणार्थियों—को पुनर्वास के तहत 5 से 7 एकड़ भूमि आबंटित की गई थी, आज विवादों के घेरे में है। लगभग 642 खातेदारों को दी गई यह जमीन मूलतः जीवन यापन के लिए थी, न कि मुनाफे के लिए। लेकिन दशकों के अंतराल में हालात बदल गए।
सूत्रों और स्थानीय स्तर पर सामने आ रही जानकारियों के अनुसार, कई मूल लाभार्थी परिवार या तो यहां स्थायी रूप से बस नहीं पाए या फिर समय के साथ क्षेत्र छोड़कर चले गए। प्रशासनिक भाषा में ऐसे मामलों को ‘भगोड़ा’ श्रेणी में रखा गया। यहीं से कथित गड़बड़ियों का सिलसिला शुरू हुआ।
आरोप है कि खाली पड़ी इन जमीनों पर बाहरी लोगों—जिन्हें स्थानीय लोग ‘फर्जी पट्टाधारी’ कह रहे हैं—ने कब्जा जमाया और राजस्व अमले के कुछ कर्मचारियों के साथ सांठगांठ कर अपने नाम पर पट्टा बनवा लिया। इतना ही नहीं, कई मामलों में खसरा और बी-1 रिकॉर्ड में भी नाम चढ़वाने की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। यानी कागजों में मालिकाना हक स्थापित कर लिया गया।
अब जब एस.ई.सी.एल. (SECL) द्वारा दुर्गापुर कोल ब्लॉक सहित अन्य परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण अंतिम चरण में है, तो सबसे बड़ा सवाल मुआवजे का है। यदि वर्तमान रिकॉर्ड को ही आधार माना गया, तो करोड़ों रुपये का मुआवजा उन लोगों के खाते में जा सकता है, जिनका उस जमीन से मूलतः कोई संबंध नहीं था।
मामला यहीं खत्म नहीं होता।
कई कथित पट्टाधारियों ने अधिग्रहण से पहले ही जमीन का डायवर्सन कर निर्माण कार्य भी कर लिया है, ताकि मुआवजा बढ़ाया जा सके। यह प्रवृत्ति न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाली भी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच केवल दस्तावेजों की गहराई से पड़ताल से ही संभव है। मूल आबंटन अभिलेख, आर.आर. (रिफ्यूजी रजिस्ट्रेशन) नंबर और राजस्व रिकॉर्ड का मिलान किया जाए, तो वास्तविक और फर्जी दावों के बीच अंतर साफ हो सकता है।
यह मामला सिर्फ जमीन या मुआवजे का नहीं है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और न्याय की कसौटी भी है। यदि समय रहते जांच नहीं हुई, तो एक ओर जहां वास्तविक हकदार वंचित रह जाएंगे, वहीं दूसरी ओर शासन को भारी राजस्व हानि उठानी पड़ सकती है।
कोयले की काली चमक के बीच यह ‘सफेद खेल’ कितना गहरा है, यह आने वाले दिनों में जांच की दिशा और प्रशासन की इच्छाशक्ति तय करेगी। फिलहाल, धर्मजयगढ़ का यह मुद्दा विकास बनाम विस्थापन की बहस से आगे बढ़कर अब ‘हक बनाम हेराफेरी’ की शक्ल ले चुका है।
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