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एथेनॉल की फैक्ट्रियों से प्यासा होगा रायगढ़? आंकड़ों के विरोधाभास ने खड़े किए बड़े सवाल, जल संकट पर चेतावनी तेज

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com

रायगढ़। जिले में प्रस्तावित एथेनॉल उद्योग अब सिर्फ औद्योगिक विकास का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह आने वाले समय के संभावित जल संकट की गंभीर चेतावनी बनकर उभर रहा है। सामाजिक संगठनों, पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय नागरिक समूहों ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता जताते हुए प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल खड़े किए हैं।

दरअसल, एथेनॉल उत्पादन में पानी की खपत को लेकर सामने आए अलग-अलग आंकड़ों ने पूरे मामले को विवादित बना दिया है। एक ओर उद्योग की परियोजना रिपोर्ट में पानी की खपत अपेक्षाकृत कम बताई गई है, वहीं दूसरी ओर भारत सरकार के खाद्य विभाग से जुड़े उच्च स्तरीय मंचों पर प्रस्तुत आंकड़े कहीं अधिक पानी की आवश्यकता दर्शाते हैं। यही विरोधाभास अब रायगढ़ के भविष्य को लेकर चिंता का कारण बन गया है।

सामाजिक संगठनों का दावा है कि यदि बड़े पैमाने पर एथेनॉल उत्पादन शुरू होता है, तो इसका सीधा असर जिले के जल स्रोतों पर पड़ेगा। पहले से ही औद्योगिक दबाव झेल रहे केलो नदी तंत्र पर अतिरिक्त भार पड़ने की आशंका जताई जा रही है। जानकारों के अनुसार, यदि जल दोहन इसी गति से बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में स्थिति भयावह हो सकती है।

मामले को लेकर “रायगढ़ बचाओ–लड़ेंगे रायगढ़” सहित कई संगठनों ने एकजुट होकर राज्य शासन को ज्ञापन सौंपा है। इसमें आरोप लगाया गया है कि पर्यावरणीय स्वीकृति देने में तथ्यों की अनदेखी की गई और परियोजना रिपोर्ट के आधार पर जल्दबाजी में अनुमति जारी कर दी गई। संगठनों का कहना है कि जिस पैमाने पर उत्पादन प्रस्तावित है, उसके अनुपात में पानी की उपलब्धता और दीर्घकालिक प्रभाव का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया।

ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि देश के अन्य राज्यों—जहां एथेनॉल उद्योग तेजी से विकसित हुआ है—वहां जल संकट की स्थिति गंभीर होती जा रही है। ऐसे उदाहरणों को देखते हुए रायगढ़ में भी इसी तरह की परिस्थिति बनने की आशंका जताई गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी औद्योगिक परियोजना की स्वीकृति से पहले उसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का गहन अध्ययन अनिवार्य है। खासतौर पर जल संसाधनों जैसे संवेदनशील विषय पर दीर्घकालिक रणनीति के बिना निर्णय लेना भविष्य के लिए जोखिम भरा हो सकता है।

इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि क्या विकास की दौड़ में जल जैसे मूलभूत संसाधन की अनदेखी की जा रही है? क्या वर्तमान जरूरतों के लिए लिए गए फैसले आने वाली पीढ़ियों को संकट में डाल देंगे?

फिलहाल प्रशासन की ओर से इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट और विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन बढ़ते विरोध और उठते सवालों के बीच यह तय है कि एथेनॉल परियोजना अब केवल उद्योग नहीं, बल्कि जनहित और पर्यावरण संतुलन का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

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Amar Chouhan

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