कोटवारी जमीन का खेल: नियम सख्त, अमल ढीला… रायगढ़ में सेवा भूमि बन गई सौदेबाजी का जरिया

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़।
जिले में कोटवारी भूमि को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। कागजों में जिस जमीन को स्पष्ट रूप से शासकीय और अहस्तांतरणीय माना गया, वही जमीन जमीनी हकीकत में खुलेआम खरीदी-बिक्री का माध्यम बनती चली गई। सवाल यह नहीं कि नियम क्या कहते हैं, बल्कि यह है कि जब नियम इतने स्पष्ट हैं तो उनका पालन क्यों नहीं हुआ।
विधानसभा के रिकॉर्ड इस मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हैं। वर्ष 2014 में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में शासन ने साफ किया था कि कोटवारों को प्रदत्त भूमि के विक्रय की कोई अनुमति नहीं दी गई है। यह भूमि किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सेवा भूमि होती है—जो उस ग्राम के कोटवार को केवल कृषि और आजीविका के लिए दी जाती है।
इसके बावजूद रायगढ़ में हालात इसके उलट नजर आते हैं। सूत्रों के अनुसार जिले में सैकड़ों प्रकरण ऐसे हैं जहां कोटवारी भूमि का विक्रय किया गया, और कई स्थानों पर यह जमीन अब उद्योगपतियों और बड़े कारोबारियों के कब्जे में है। स्थिति इतनी गंभीर बताई जाती है कि रायगढ़ तहसील क्षेत्र में कोटवारी भूमि लगभग समाप्ति की स्थिति में पहुंच चुकी है।
प्रशासनिक आदेश—सिर्फ फाइलों तक सीमित
राजस्व विभाग ने समय-समय पर इन अनियमितताओं को सुधारने के लिए निर्देश जारी किए। पूर्व कलेक्टर के निर्देश पर जिलेभर की कोटवारी भूमि का ब्यौरा मंगाया गया था, जिसमें गड़बड़ियां सामने आईं। इसके बाद आदेश दिए गए कि
– ऐसी भूमि को पुनः शासकीय दर्ज किया जाए
– रिकॉर्ड दुरुस्त किए जाएं
– और अवैध विक्रय करने वालों पर कार्रवाई की जाए
लेकिन यह पूरा अभियान कागजों तक ही सिमट कर रह गया। जमीनी स्तर पर न तो जमीन वापस ली गई और न ही दोषियों पर प्रभावी कार्रवाई हो सकी।
राजस्व मंडल का हस्तक्षेप भी बेअसर
कोटवारी भूमि के मामलों में एक समय ऐसा भी आया जब कुछ प्रकरणों में अनुमति हासिल कर ली गई थी। बाद में राजस्व मंडल, बिलासपुर के तत्कालीन अध्यक्ष डी.एस. मिश्रा ने पुनर्विलोकन करते हुए रायगढ़ के 34 प्रकरणों में दी गई अनुमतियों को निरस्त कर दिया।
साथ ही स्पष्ट निर्देश दिया गया कि
– इन जमीनों को सेवा भूमि के रूप में दर्ज किया जाए
– और अवैध विक्रय में शामिल लोगों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जाएं
लेकिन यहां भी कार्रवाई अधूरी ही रह गई।
फाइलें गायब—जवाबदेही भी गायब?
मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब संबंधित फाइलों के गायब होने की बात सामने आई। जानकारी के अनुसार, तत्कालीन तहसीलदार द्वारा एफआईआर के लिए पत्र लिखे जाने के बाद पुलिस ने दस्तावेज मांगे, लेकिन राजस्व कार्यालय से फाइलें ही उपलब्ध नहीं कराई जा सकीं। बाद में यह कहकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया कि फाइलें मिल नहीं रही हैं।
इस घटनाक्रम ने प्रशासनिक तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
किसके हाथों में पहुंची जमीन..
जांच में सामने आया है कि कोटवारी भूमि की खरीदी-बिक्री में कई बड़े नाम शामिल हैं—जिनमें स्थानीय उद्योगपति, बिल्डर और कारोबारी प्रमुख रूप से शामिल बताए जाते हैं।
इन्होंने खरीदी कोटवारी जमीन
आलोक इन्फोटेक प्रालि डायरेक्टर अमित रतेरिया रायगढ़, कोरबा वेस्ट पावर कंपनी की ओर से अजीत चोपड़े, वीसा स्टील लि. की ओर से वीरेंद्र पिता बनवासी लाल अग्रवाल रायगढ़, बालाजी बिल्डकॉन, सद्गुरु डेवलपर्स रायगढ़, रत्थूराम चौहान कृष्णापुर रायगढ़, देवकीनंदन मित्तल कोंड़ातराई, मनीष अग्रवाल रायगढ़, पवन कुमार मित्तल रायगढ़, पवन कुमार पिता चिंताराम, बालाजी बिल्डकॉन, एटी गोल्ड प्रालि, वेंकटेश कृषि सेवा केंद्र, श्यामली इंफ्रावेंचर्स, गणपति बिल्डकॉन, विष्णु डेवलपर्स, कल्पेश पटेल, पवन चौहान, दिनेश अग्रवाल, कमल किशोर अग्रवाल, ललित अग्रवाल, सुनील सुल्तानिया, मुकेश अग्रवाल आदि शामिल हैं।
इससे यह भी संकेत मिलता है कि यह सिर्फ छोटे स्तर का उल्लंघन नहीं, बल्कि एक संगठित पैटर्न के तहत हुआ मामला हो सकता है।
नियम बनाम हकीकत
रायगढ़ का यह मामला प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जमीनी अमल के बीच की खाई को उजागर करता है। एक ओर स्पष्ट नियम हैं, दूसरी ओर उनका खुलेआम उल्लंघन—और बीच में कहीं खो जाती है जवाबदेही।
अब सवाल यह है कि क्या लंबित आदेशों को लागू कर कोटवारी भूमि को उसकी मूल स्थिति में वापस लाया जाएगा, या फिर यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा।
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