“मांड नदी पर ‘मिट्टी का हमला’: छाल खदान की ढुलाई से बढ़ता पर्यावरणीय संकट बांधापाली की जनसुनवाई से उठे गंभीर सवाल”


Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com

रायगढ़, 30 सितम्बर।
मांड नदी के किनारों पर कोयला खदान से निकाली जा रही ओवरबर्डन (मिट्टी/मलबा) की लगातार डंपिंग ने अब पर्यावरणीय चिंता को खुली बहस का विषय बना दिया है। दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के छाल एरिया की खदानों से निकली यह मिट्टी बरसात और बहाव के साथ मांड नदी में समा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि पूरे मांड-रायगढ़ कोलफील्ड के पारिस्थितिकी तंत्र पर दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाली स्थिति है।
उल्लेखनीय है कि मांड नदी, महानदी की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है और इसी घाटी में बड़े पैमाने पर कोयला खनन गतिविधियां संचालित हैं । ऐसे में नदी तंत्र पर किसी भी प्रकार का प्रदूषण व्यापक भू-भाग को प्रभावित करता है।

क्या हो रहा है जमीनी स्तर पर?
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, खदान से निकली भारी मात्रा में मिट्टी को नदी किनारे डंप किया जा रहा है। बरसात के दौरान यह ढेर बहकर सीधे नदी में पहुंच जाता है। इससे नदी का प्राकृतिक प्रवाह, जल की गुणवत्ता और आसपास की कृषि भूमि प्रभावित हो रही है।
संभावित पर्यावरणीय प्रभाव –
1. नदी का उथलीकरण (Siltation)
मिट्टी के बहाव से नदी तल में गाद जमने लगती है, जिससे नदी उथली हो जाती है। इससे बाढ़ का खतरा बढ़ता है और जलधारा की क्षमता घटती है।
2. जल प्रदूषण और जलीय जीवन पर असर
खनन क्षेत्र की मिट्टी में कोयला कण, भारी धातुएं और रासायनिक तत्व मिल सकते हैं। इनके नदी में पहुंचने से पानी की गुणवत्ता खराब होती है, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों का जीवन संकट में पड़ सकता है।
देश में अन्य मामलों में औद्योगिक प्रदूषण से नदियों का पानी काला पड़ने और जलीय जीवों की मौत तक देखी गई है ।
3. कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव
नदी किनारे की खेती सीधे इस प्रदूषित पानी पर निर्भर रहती है। मिट्टी में रासायनिक तत्व मिल जाने से फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
4. भूजल और पेयजल संकट
नदी में प्रदूषण का असर धीरे-धीरे भूजल तक पहुंच सकता है, जिससे गांवों में पीने के पानी की समस्या और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं।
5. जैव विविधता पर खतरा
मांड घाटी पहले से ही खनन गतिविधियों के कारण दबाव में है। नदी तंत्र के बिगड़ने से वन्यजीवों और स्थानीय पारिस्थितिकी पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
6. सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
मछुआरे, किसान और नदी पर निर्भर समुदाय सीधे प्रभावित होंगे। यह आजीविका का संकट भी बन सकता है।
कानूनी और प्रशासनिक पहलू
पर्यावरण संरक्षण कानूनों के तहत किसी भी खनन परियोजना को नदी, जलस्रोत और पर्यावरण पर प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए सख्त प्रावधानों का पालन करना होता है। यदि डंपिंग से प्रदूषण हो रहा है, तो यह पर्यावरणीय शर्तों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।
बांधापाली में हुई जनसुनवाई – सवालों के घेरे में परियोजना
इसी बीच, बांधापाली में बीते दिन SECL द्वारा पर्यावरणीय जनसुनवाई कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। यह जनसुनवाई प्रस्तावित विस्तार और खनन गतिविधियों को लेकर है, जहां प्रभावित ग्रामीणों और विशेषज्ञों की राय दर्ज की गई है।
ऐसे समय में जब मांड नदी में मिट्टी बहने की शिकायतें सामने आ रही हैं, जनसुनवाई का महत्व और बढ़ जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।
मांड नदी में खदान की मिट्टी का बहाव केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, खनन प्रबंधन और जनहित से जुड़ा बड़ा सवाल है।
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