पंचायत कर्मचारियों की पेंशन पर हाईकोर्ट का अहम फैसला, वैधानिक आधार के बिना नहीं मिलेगा सेवानिवृत्ति लाभ

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 20 से अधिक याचिकाएं कीं खारिज, कहा—पंचायत राज अधिनियम की धारा 131 से पैदा नहीं होता नया पेंशन अधिकार
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में पंचायतों के अंतर्गत कार्यरत रहे सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन का लाभ दिए जाने की मांग पर हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पेंशन से संबंधित आदेशों को चुनौती देने वाली 20 से अधिक याचिकाओं को खारिज कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल पंचायत में सेवा करने के आधार पर किसी कर्मचारी को पेंशन पाने का स्वतः वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। इसके लिए संबंधित सेवा नियमों या लागू पेंशन योजना में स्पष्ट प्रावधान होना आवश्यक है।
जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान या पेंशन योजना प्रस्तुत नहीं कर सके, जिसके आधार पर वे पेंशन के स्वतंत्र अधिकार का दावा कर सकें। अदालत के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या पंचायत कर्मचारियों को लागू सेवा शर्तों और छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 के प्रावधानों के आधार पर नियमित पेंशन का अधिकार दिया जा सकता है।
पंचायत कर्मचारी और शासकीय कर्मचारी की सेवा व्यवस्था अलग
मामले में हाईकोर्ट ने पंचायत कर्मचारियों की सेवा संबंधी स्थिति पर विचार करते हुए कहा कि पंचायत कर्मचारी केवल अपनी नियुक्ति के आधार पर राज्य शासन के नियमित शासकीय कर्मचारी नहीं माने जा सकते। उनके भर्ती, सेवा और सेवानिवृत्ति से जुड़े मामलों में पंचायतों के लिए निर्धारित अलग नियम लागू होते हैं।
अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं को यह स्पष्ट करना था कि उनकी नियुक्ति के समय प्रभावी सेवा शर्तों के तहत उन्हें पेंशन का अधिकार किस नियम या योजना से प्राप्त था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, संबंधित कर्मचारियों की सेवा शर्तों में सेवानिवृत्ति लाभ के लिए अंशदायी भविष्य निधि (कॉन्ट्रिब्यूटरी प्रोविडेंट फंड) की व्यवस्था थी। याचिकाकर्ता इस योजना के लाभ से भी इनकार नहीं कर सके।
धारा 131 को लेकर अदालत ने क्या कहा?
याचिकाकर्ताओं की ओर से छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 131 के आधार पर पेंशन संबंधी दावे किए गए थे। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस प्रावधान की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि यह धारा पहले से उपलब्ध वेतन, भत्ते, पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों के संरक्षण से संबंधित है। इसके आधार पर ऐसा नया पेंशन अधिकार पैदा नहीं किया जा सकता, जो संबंधित कर्मचारी को लागू नियमों के तहत पहले से प्राप्त ही नहीं था।
अदालत के इस निष्कर्ष का मूल आधार यह रहा कि किसी लाभ के संरक्षण और नया अधिकार सृजित करने के बीच कानूनी अंतर है। यदि किसी कर्मचारी की सेवा शर्तों में नियमित पेंशन का प्रावधान ही नहीं है, तो केवल सामान्य वैधानिक संरक्षण के आधार पर पेंशन की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
दूसरी जनपद पंचायतों में पेंशन भुगतान की दलील भी नहीं आई काम
याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क भी रखा था कि प्रदेश की कुछ अन्य जनपद पंचायतों में सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन का भुगतान किया जा रहा है। उनके अनुसार, समान परिस्थितियों में काम करने वाले कर्मचारियों के बीच इस तरह का अंतर उचित नहीं है।
इस पर राज्य शासन की ओर से बताया गया कि गुंडरदेही और तखतपुर जनपद पंचायतों में कुछ कर्मचारियों को स्थानीय स्तर पर गठित पेंशन निधि से भुगतान किया जा रहा है। यह भुगतान किसी राज्यव्यापी वैधानिक पेंशन योजना के अंतर्गत नहीं किया जा रहा था। राज्य की ओर से यह भी बताया गया कि संबंधित भुगतान के आधार को लेकर अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं।
हाईकोर्ट ने इस दलील को नियमित पेंशन का सार्वभौमिक अधिकार स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। अदालत के अनुसार, किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा स्थानीय स्तर पर भुगतान किए जाने से समान परिस्थितियों वाले सभी पंचायत कर्मचारियों को अपने आप वैधानिक पेंशन का अधिकार नहीं मिल जाता।
नीति बनाना सरकार का काम, अदालत नहीं दे सकती नया पेंशन अधिकार
फैसले में न्यायालय ने न्यायिक अधिकार क्षेत्र की सीमा को भी रेखांकित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून बनाना और किसी विशेष पेंशन नीति को लागू करने का निर्णय लेना विधायिका तथा सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है। न्यायपालिका कानून में मौजूद प्रावधानों की व्याख्या कर सकती है, लेकिन किसी ऐसे अधिकार का सृजन नहीं कर सकती, जिसका आधार लागू कानून या नियमों में मौजूद न हो।
इस टिप्पणी के साथ अदालत ने पेंशन की मांग को स्वीकार करने के लिए आवश्यक वैधानिक आधार के अभाव को महत्वपूर्ण माना।
रायगढ़ समेत कई जिलों के कर्मचारियों की याचिकाएं खारिज
इस मामले में दंतेवाड़ा, बस्तर, रायगढ़, बीजापुर, मुंगेली, धमतरी, सक्ती, कांकेर, दुर्ग, सुकमा सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों से जुड़े 20 से अधिक याचिकाकर्ताओं ने पेंशन से इनकार करने वाले आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिकाओं में समान कानूनी प्रश्न उठाए जाने के कारण हाईकोर्ट ने सभी मामलों की एक साथ सुनवाई की। अंततः अदालत ने पेंशन के दावे स्वीकार करने के लिए पर्याप्त वैधानिक आधार नहीं पाए जाने पर याचिकाएं खारिज कर दीं।
फैसले का व्यावहारिक महत्व
इस निर्णय से पंचायतों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पेंशन संबंधी दावों में लागू सेवा नियमों और वैधानिक प्रावधानों की भूमिका एक बार फिर स्पष्ट हुई है। हालांकि, किसी कर्मचारी का मामला किस नियम, नियुक्ति आदेश, सेवा शर्त या अलग पेंशन योजना के अंतर्गत आता है, इसका निर्धारण संबंधित दस्तावेजों के आधार पर ही किया जा सकता है।
यह फैसला अपने आप में यह निष्कर्ष नहीं देता कि पंचायतों से जुड़े हर कर्मचारी को किसी भी परिस्थिति में कोई सेवानिवृत्ति लाभ नहीं मिल सकता। इसका प्रमुख संदेश यह है कि नियमित पेंशन का दावा संबंधित कर्मचारी पर लागू कानून, सेवा नियमों और योजना के स्पष्ट प्रावधानों के आधार पर ही तय होगा।

(संपादकीय टिप्पणी: यह समाचार उपलब्ध प्रकाशित विवरण के आधार पर तैयार किया गया है। फैसले की सटीक कानूनी व्याख्या और उसके व्यापक प्रभाव के लिए हाईकोर्ट के मूल आदेश का अवलोकन किया जाना उचित होगा।)
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