ओपन कास्ट पर ब्रेक, अंडरग्राउंड को बढ़ावा: भू-अर्जन की चुनौती के बीच रायगढ़ के कोल ब्लॉक्स पर केंद्र की नई रणनीति

रायगढ़।कोयला खनन की नीतियों में एक अहम मोड़ लेते हुए केंद्र सरकार ने अब भू-अर्जन की जटिलताओं से बचने के लिए अंडरग्राउंड (भूमिगत) खनन को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। ताजा संकेत रायगढ़ जिले से मिले हैं, जहां प्रस्तावित कोल ब्लॉक्स के आवंटन में ओपन कास्ट की बजाय भूमिगत खनन मॉडल को लागू करने की दिशा तय कर दी गई है।
दरअसल, कोयला मंत्रालय द्वारा हाल ही में 26 कोल ब्लॉक्स की सूची नीलामी के लिए जारी की गई है, जिसमें छत्तीसगढ़ के 5 ब्लॉक्स शामिल हैं—और ये सभी रायगढ़ जिले के अंतर्गत आते हैं। इनमें झारपालम टांगरघाट, कारीछापर वेस्ट, नवागांव ईस्ट, नवागांव वेस्ट और बायसी जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जो पहले से ही खनन प्रस्तावों और जनसुनवाई को लेकर चर्चा में रहे हैं।
भू-अर्जन बना सबसे बड़ी अड़चन
सरकार के इस नीति परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह जमीन अधिग्रहण में आ रही बाधाएं मानी जा रही हैं। रायगढ़ सहित कई क्षेत्रों में ओपन कास्ट खदानों के विरोध ने न केवल जनसुनवाई प्रक्रियाओं को प्रभावित किया, बल्कि परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में भी रुकावट पैदा की। ऐसे में अब चार प्रमुख ब्लॉक्स—झारपालम टांगरघाट, कारीछापर वेस्ट, नवागांव ईस्ट और नवागांव वेस्ट—को अनिवार्य रूप से अंडरग्राउंड माइंस के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया गया है।
नीति स्पष्ट: बदलाव की गुंजाइश खत्म
कोयला मंत्रालय के निर्देश के अनुसार, इन ब्लॉक्स को हासिल करने वाली कंपनियां पूरे खनन काल में इन्हें ओपन कास्ट या मिक्स्ड मोड में परिवर्तित नहीं कर सकेंगी। यानी एक बार अंडरग्राउंड मॉडल तय होने के बाद उसमें कोई बदलाव संभव नहीं होगा। इसे नीलामी की शर्तों में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।
बिडर्स को रियायत, निवेश को बढ़ावा
अंडरग्राउंड खनन अपेक्षाकृत महंगा होता है, इसलिए संभावित निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कुछ रियायतें भी दी गई हैं। बिडर्स को परफॉर्मेंस सिक्योरिटी में करीब 50 प्रतिशत तक छूट और फ्लोर प्राइस में 2 प्रतिशत की राहत दी जाएगी। माना जा रहा है कि इससे प्रतिस्पर्धी बोली को बढ़ावा मिलेगा।
जंगल और विस्थापन पर असर कम करने की कोशिश
सरकार के इस फैसले के पीछे पर्यावरणीय और सामाजिक दबाव भी अहम कारण है। ओपन कास्ट खनन में बड़े पैमाने पर जंगल कटाई और विस्थापन होता है, जिससे स्थानीय स्तर पर विरोध तेज होता है। भूमिगत खनन से इन प्रभावों को सीमित करने की कोशिश की जा रही है। रायगढ़ के धरमजयगढ़, तमनार और घरघोड़ा जैसे क्षेत्रों में सघन वन क्षेत्र हैं, जहां इस नई नीति से राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
करीब 50 वर्ग किमी क्षेत्र प्रभावित
चयनित पांचों कोल ब्लॉक्स का कुल क्षेत्रफल लगभग 50 वर्ग किलोमीटर के आसपास है—
झारपालम टांगरघाट: 11.64 वर्ग किमी
बायसी: 5.39 वर्ग किमी
नवागांव ईस्ट: 14.06 वर्ग किमी
नवागांव वेस्ट: 9.42 वर्ग किमी
कारीछापर वेस्ट: 7.86 वर्ग किमी
स्थानीय विरोध के बीच संतुलन की कोशिश
रायगढ़ में बीते समय में कोल माइंस को लेकर कई बार विरोध और जनसुनवाई में व्यवधान सामने आए हैं। ऐसे में केंद्र सरकार का यह कदम विकास और सामाजिक स्वीकार्यता के बीच संतुलन साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
अब निगाहें नीलामी प्रक्रिया और इसके बाद कंपनियों की भागीदारी पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि अंडरग्राउंड खनन की शर्तों के साथ कितनी कंपनियां आगे आती हैं और यह मॉडल जमीन पर कितना सफल साबित होता है।
फिलहाल इतना तय है कि रायगढ़ के कोल सेक्टर में यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नीति और सामाजिक दृष्टिकोण के स्तर पर भी बड़ा संकेत है—जहां ‘खनन’ के साथ ‘संवेदनशीलता’ को जोड़ने की कोशिश दिखाई दे रही है।
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