खुशबू से सराबोर रक्षाबंधन: खस से बनी अनोखी राखियाँ घोलेंगी परंपरा में नवाचार, पानी की बूंद पड़ते ही बिखेरेंगी खुशबू

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायपुर। रक्षाबंधन का पर्व इस बार छत्तीसगढ़ में एक नई खुशबू और नए विचार के साथ मनाया जा रहा है। पारंपरिक राखियों के बीच खस (वेटिवर) की जड़ों से तैयार की गई अनोखी राखियां आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। इन राखियों की खासियत यह है कि पानी की एक बूंद पड़ते ही ये अपनी सोंधी, मनमोहक सुगंध बिखेरने लगती हैं, जिससे भाई-बहन के रिश्ते में एक नया एहसास जुड़ रहा है।
राज्य में वन संपदा और स्थानीय हुनर को बढ़ावा देने की दिशा में यह पहल न केवल सांस्कृतिक महत्व रखती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका से भी सीधे तौर पर जुड़ी है। पूरी तरह प्राकृतिक, हाथ से बनी और बायोडिग्रेडेबल इन राखियों को त्वचा के लिए सुरक्षित बताया जा रहा है।
परंपरा और प्रकृति का संगम
वन मंत्री केदार कश्यप की मंशा के अनुरूप वन आधारित उत्पादों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा यह अभिनव पहल की गई है। बोर्ड के मार्गदर्शन में नगरी (जिला धमतरी) स्थित अन्नपूर्णा महिला स्व-सहायता समूह की 10 महिलाओं ने मिलकर करीब 1,000 राखियां तैयार की हैं।
यह पहल इस बात का उदाहरण बनकर उभरी है कि किस तरह पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक सोच को जोड़कर नए उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। खस जैसी सुगंधित वनस्पति का उपयोग कर बनाई गई ये राखियां स्थानीय संसाधनों की उपयोगिता को भी रेखांकित करती हैं।
पानी की बूंद से महकता स्नेह
इन राखियों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी प्राकृतिक सुगंध है। सामान्य राखियां जहां केवल सजावट का माध्यम होती हैं, वहीं खस से बनी राखियां नमी के संपर्क में आते ही खुशबू बिखेरती हैं। बारिश के मौसम या हाथ धोते समय जब पानी की बूंद राखी पर गिरती है, तो उससे निकलने वाली सुगंध भाई-बहन के रिश्ते को एक अलग ही भावनात्मक स्पर्श देती है।
रोजगार के साथ नवाचार की राह
यह पहल केवल त्योहार तक सीमित नहीं है, बल्कि वन आधारित उत्पादों के जरिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित करने का भी प्रयास है। स्व-सहायता समूहों को इस तरह के उत्पादों के निर्माण से जोड़कर ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में कदम उठाया गया है।
वन मंत्री केदार कश्यप का कहना है कि इस रक्षाबंधन पर बहनों का प्यार सिर्फ राखी के धागे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसकी खुशबू भी भाइयों की कलाई पर महसूस होगी। यह पहल छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक विरासत को एक साथ जोड़ने का सशक्त माध्यम बन सकती है।
रिश्तों में घुली छत्तीसगढ़ की खुशबू
खस से बनी राखियां इस बात का प्रतीक बन रही हैं कि परंपरा में नवाचार का समावेश कैसे किया जा सकता है। जब बहन अपने भाई की कलाई पर यह राखी बांधेगी, तो उसके साथ प्रकृति, संस्कृति और स्नेह का अद्भुत संगम भी बंधेगा—जो न सिर्फ दिखेगा, बल्कि हर बूंद के साथ महकेगा भी।
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