‘बोल बम’ के जयघोष के बीच कसडोल से निकली भव्य कांवड़ यात्रा, 1500 से अधिक श्रद्धालुओं की रही भागीदारी (देखें वीडियो)

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
‘बोल बम’ की गूंज से सराबोर रहा तमनार अंचल: बाबा धाम कोसमनारा तक निकली कांवड़ यात्रा, महाकाल शिवलिंग बना आस्था का केंद्र

तमनार/रायगढ़, 17 अगस्त 2026।
श्रावण मास के अंतिम पड़ाव में रविवार की रात कसडोल से कोसमनारा तक भक्ति और उत्साह का अनूठा संगम देखने को मिला। ‘बोल बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष के बीच निकली जलाभिषेक कांवड़ यात्रा ने पूरे मार्ग को धार्मिक रंग में रंग दिया। ग्राम कसडोल स्थित माँ घटोरिया मंदिर से प्रारंभ हुई इस यात्रा में लगभग 1500 से अधिक महिला-पुरुष श्रद्धालुओं की भागीदारी दर्ज की गई, जो देर रात तक अनुशासन और आस्था के साथ आगे बढ़ते रहे।
रात्रि करीब 10 बजे शुरू हुई कांवड़ यात्रा भैंसगढ़ी, बरलिया, दनोट और उर्दना जैसे प्रमुख ग्रामों से होकर गुजरती हुई बाबा धाम कोसमनारा पहुंची। मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं का स्वागत और उत्साहजनक माहौल देखने को मिला। कई स्थानों पर भक्त डीजे की धुन पर नाचते-गाते आगे बढ़े, जिससे यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर एक सामूहिक सांस्कृतिक आयोजन का रूप लेती नजर आई।

इस बार की यात्रा की विशेषता महाकाल स्वरूप शिवलिंग का निर्माण और उसका साथ में ले जाना रहा। पूरे मार्ग में यह शिवलिंग श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना रहा, जहां भक्तों ने रुक-रुक कर पूजन-अर्चन किया। इससे यात्रा को एक अलग धार्मिक गरिमा और आकर्षण मिला, जो लंबे समय तक लोगों के स्मरण में रहेगा।

आयोजन समिति (GPPS) द्वारा व्यवस्थाओं को लेकर भी विशेष सतर्कता बरती गई। श्रद्धालुओं के लिए रात्रि 8 बजे से 9:30 बजे तक पूड़ी-सब्जी का प्रसाद वितरण किया गया, जिससे दूर-दराज से आए कांवड़ियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो। इसके अलावा यात्रा समाप्ति के बाद कोसमनारा से वापसी के लिए वाहनों की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई, जिससे आवागमन सुरक्षित और सुगम बना रहा।

आयोजकों के अनुसार यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सामूहिक सहभागिता का भी प्रतीक है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से गांवों के बीच आपसी संबंध मजबूत होते हैं और युवा पीढ़ी को परंपराओं से जोड़ने का अवसर मिलता है।
पूरी यात्रा के दौरान अनुशासन, सुरक्षा और सहयोग का जो स्वरूप सामने आया, वह इस बात का संकेत है कि क्षेत्र में धार्मिक आयोजनों के प्रति जागरूकता और जिम्मेदारी दोनों बढ़ी हैं। कसडोल से कोसमनारा तक की यह कांवड़ यात्रा एक बार फिर यह साबित कर गई कि आस्था जब संगठित होती है, तो वह समाज को जोड़ने की मजबूत कड़ी बन जाती है।
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