भारत के राज्य खनिज रॉयल्टी के मामले में केंद्र सरकार के मोहताज होंगे

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रांची। भारतीय संविधान के अनुसार भारत राज्यों का संघ है । इसका विश्लेषण करेंगे तो राज्यों को भी अपने लिए कुछ कानून बनाने का अधिकार है। इसी कार्य को करने के लिए राज्यों में विधानसभा बनाई गई थी। देश के विकास की जरूरत को पूरा करने के लिए कई राज्यों में लगभग 57 किस्म के खनिजों का खनन हो रहा है। इन खनन परियोजनाओं से राज्यों और केंद्र सरकार को रायल्टी के माध्यम से बहुत बड़ी राजस्व की प्राप्ति होती आ रही है ।
केंद्र सरकार ने माइंस मिनरल्स डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन एक्ट 1957 की धारा 9 एवं इसकी उप -धाराओं के अंतर्गत रॉयल्टी ले रही है । धारा 9 b में डिस्ट्रिक्ट मिनिरल फाऊंडेशन के तहत उसे जिला के कुल रॉयल्टी का 10% हिस्सा डिस्ट्रिक्ट मिनिरल फाऊंडेशन ट्रस्ट डीएमएफटी में जमा होता है । यह फंड विस्थापित परिवारों के विकास एवं सहयोग के लिए बनाया गया था, परंतु आज तक इसका उपयोग गैर विस्थापित क्षेत्र के लिए ज्यादा होता आ रहा है और विस्थापित लोग ठगे जा रहे हैं ।
एमटीआर एक्ट में खनिजों की रॉयल्टी का अधिकांश हिस्सा NMET (नेशनल मिनिरल एक्सप्लोरेशन ट्रस्ट) के खाते में जमा किया जाता है। वास्तव में इस फंड का उपयोग देश में खनिज क्षेत्र के विकास के लिए तथा उन प्रभावित गांवों के विकास के लिए करना था परंतु जिस पार्टी की सरकार रही है वह इसका दुरुपयोग अपनी सत्ता प्राप्ति के लिए किया है । विस्थापित अपने आप को ठगा हुआ महसूस करते आ रहे हैं । इन्हीं कारणों से देश का ऐसा कोई भी हिस्सा नहीं है जो आराम से अपनी जमीन खनिजों के खनन परियोजनाओं के लिए देने को तैयार है । ऐसा इसलिए क्योंकि जमीनदाता इन परियोजनाओं में जमीन देकर दर – दर की ठोकरें खाता है। उनका सम्मान और जीविका दोनों खत्म हो जाते हैं ।
भारत के संविधान में तीन प्रकार की सूची है – केंद्र, राज्य एवं समवर्ती सूची । जमीन से संबंधित मामले राज्य सूची में शामिल है। अतः जमीन पर कर लगाने की शक्ति राज्य सरकारों के पास है। सीबीए एक्ट में भी कंपनियां सिर्फ कोयला निकाल सकती हैं। खनन पूर्ण होने के बाद जमीन को रैयतों को वापस कर देना चाहिए, परंतु, मेरी जानकारी में ऐसा नहीं हुआ है। इसके अलावा सीबीए एक्ट जनता के मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन करता है ।
झारखंड सरकार ने खनन परियोजनाओं से सेस लेने के लिए “झारखंड खनिज आधारित भूमि उपकर अधिनियम, 2024 ” पारित किया जिसके अंतर्गत सभी खनन परियोजनाओं से (लघु खनिज छोड़कर ) एक निश्चित दर पर जैसे कोयला पर ₹100 प्रति टन कर लगाया । इस टैक्स से राज्य में 8000 से 10000 करोड रूपए राजस्व की प्राप्ति हो रही थी। इस अधिनियम के अनुसार राज्य इस रकम को निम्न मदों में खर्च करने की योजना बनाई थी
1. स्वास्थ्य सेवा, विद्यालय और उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए
2. सामाजिक सुरक्षा सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए
3. ग्रामीण सड़क, ग्रामीण
आवास , पीने का पानी ,
स्वच्छता बिजली आपूर्ति
आदि के लिए
4. कृषि और संबद्ध क्षेत्र के विकास के लिए
5. अन्य आवश्यक उद्देश्यों के लिए जैसा कि सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित किया किया जाएगा।
झारखंड सरकार ने इस कानून को माननीय सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले के आधार पर किया जो जुलाई 2024 में 9 न्यायाधीशों के संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत से पारित किया था , जिसमें कहा गया कि राज्यों के पास खनिज युक्त भूमि और खनिज अधिकारों पर कर (टैक्स) या सेस लगाने का अधिकार है । अदालत ने स्पष्ट करते हुए कहा है कि केंद्र को दी जाने वाली रॉयल्टी कोई ”TAX” नहीं है , और एम एम डी आर एक्ट 1957 राज्यों को कर लगाने से नहीं रोकता है।
झारखंड सरकार ने इस मद से प्राप्त रकम का अधिकांश हिस्सा अपने चुनावी लाभ के लिए मइयां योजना में खर्च किया ताकि वोट बैंक बनाया जा सके । 2025 – 26 में झारखंड सरकार ने इस मदद से लगभग 9000 करोड रुपए का राजस्व प्राप्त किया है तथा केंद्र सरकार के पास ब्याज सहित 1,41,000 करोड़ रूपया बकाया है जिसकी मांग मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बार-बार करते हैं ।
अगर इस धन का उपयोग राज्य की शिक्षा व्यवस्था को ठीक करने के लिए किया गया होता तो राज्य से बाहर युवकों को जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
नरेंद्र मोदी ने खान खनिज विकास विनिमयन अधिनियम 1957 की धारा 9 में एक संशोधन करते हुए जिसमें राज्य सरकारों को केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों प्रतिबंधों के बिना खनिज अधिकारों और खनिज भूमि पर कोई नया कर लगाने से रोक दिया है । इस बदलाव के लिए सरकार ने जो तर्क दिए हैं वह सिर्फ पूंजीपतियों के लाभ को बढ़ाने वाला है।
कोयला के खनन के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है अगर कोयला का बाजार मूल्य ₹4000 प्रतिटन है तो खनन खर्च मात्र 1500 से 18 सो रुपए परिवहन ₹400 राज्य का टैक्स ₹100 केंद्र की रॉयल्टी ₹400 से ₹600 होता है अर्थात वर्तमान समय में परियोजना के मालिक को प्रतिटन ₹1000 की बचत होती है जो सभी के हिस्सेदारी में सबसे ज्यादा है ।अगर ₹100 राज्य का सेस बंद कर दिया जाए तो उसके मुनाफे में ₹100 प्रतिदिन की वृद्धि हो जाती है । इससे यह समझा जा सकता है कि यह कदम पूंजीपतियों को लाभ देने के लिए किया गया है या देश की जनता को ।
दूसरी तरफ इस प्रकार के कर से राज्य सरकार को रोकने से राज्यों खास कर झारखंड को एक बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा जिसका असर राज्यों के अंतर्गत आने वाले ग्रामीण विकास कार्यों पर पड़ेगा । अब राज्यों को केंद्र से भीख मांगनी पड़ेगी और अगर केंद्र में दूसरे दल की सरकार है तो उसे लंबे समय तक टाल मटोल करके निकम्मा साबित करने की कोशिश किया जाएगा और इसका नाजायज राजनैतिक लाभ लिया जाएगा।
हम सब क्या करें
1. जनता का संघर्ष –
वर्तमान समय में एमएमडीआर एक्ट , सीबीए एक्ट जन विरोधी हैं। संविधान की धारा 39B में कहा गया है कि देश की भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिसमें समुदाय के अहितकर संकेंद्रण ना हो इसका अर्थ भौतिक संसाधनों पर सामुदायिक स्वामित्व के रूप में देखा जाता है । केंद्र सरकार को ऐसा कानून बनना चाहिए जिसमें खनिजों पर स्थानीय समुदाय का अथवा ग्राम सभा का स्वामित्व होना चाहिए । इस रास्ते से देश में करोड़ों करोड़पति बन सकते हैं और बिना किसी व्यवधान की खनन कार्य भी चलाया जा सकता है । पिछले कुछ वर्षों में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस प्रकार के विचार और फैसले दिए हैं जहां उसने स्पष्ट किया है कि जमीन मालिक ही खनिज का मालिक है सरकार नहीं। एम एम डी आर एक्ट का अनुच्छेद 13 भी संविधान के विपरीत है क्योंकि जब सरकार खनिजों के मालिक ही नहीं है तो उसे पर कानून बनाकर उसकी लूट करना और रैयातो को न्यूनतम लाभ देकर विस्थापित करना ना तो नैतिक कहा जाएगा और ना ही संवैधानिक। अतः खनिज संपन्न राज्यों को इस प्रकार के कानून को पूर्ण रूपेण समाप्त कर संविधान की धारा 39 बी के तहत जनता की मालकियत स्थापित करने वाला अधिनियम बनाने हेतु आंदोलन करना चाहिए ।
2. झारखंड सरकार क्या करे
झारखंड सरकार को जमीन संबंधी अपने सभी अधिकारियों को भूमि अधिग्रहण के कार्य से बाहर करके केंद्र पर दबाव बनाना चाहिए। ग्राम सभा को राज्य सरकार के साथ मिलकर प्रोड्यूसर कंपनी बनाकर खनन का लीज़ प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है । ऐसा करके झारखंड को आर्थिक रूप से बहुत मजबूत किया जा सकता है।
ऊपर की असहमति पर दूसरा कार्य किया जा सकता है जिसमें रॉयल्टी का उचित बटवारा हो सके ताकि प्रभावित गांवों और राज्यों को आर्थिक लाभ मिल सके।
मेरे अनुसार यह बंटवारा इस प्रकार हो सकता है-
कुल रॉयल्टी का 5% ग्राम सभा , 5% प्रखंड या तहसील, 10% जिला , 40% राज्य और 40% केंद्र सरकार को दिया जाय।
अपने राज्य को वित्तीय मजबूती और संसाधनों पर स्वामित्व स्थापित करने के लिए जोरदार संघर्ष करने के लिए एकजुट हों।
मिथिलेश कुमार दांगी
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