अंबिकापुर के नामी स्कूल में ‘सजा’ के नाम पर शर्मनाक हरकत: 8वीं के छात्र से 200 बार गाली लिखवाई, अभिभावकों में उबाल

Journalist Amardeep Chauhan
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अंबिकापुर। शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले स्कूल में अनुशासन के नाम पर जो हुआ, उसने न सिर्फ अभिभावकों को आक्रोशित कर दिया है बल्कि शिक्षण पद्धति और बाल मनोविज्ञान पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के एक प्रतिष्ठित निजी संस्थान, बिरला ओपन माइंड इंटरनेशनल स्कूल में कक्षा आठवीं के एक छात्र को कथित तौर पर ऐसी सजा दी गई, जिसे सुनकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का मन विचलित हो सकता है।
घटना 28 जुलाई की बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार, कक्षा में दो छात्रों के बीच मामूली विवाद हुआ, जिसमें आवेश में आकर अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया। आरोप है कि इसी प्रकरण में एक छात्र को दंडित करते हुए शिक्षिका ने उसे कॉपी में 100 बार हिंदी और 100 बार अंग्रेजी में ‘मां से जुड़ा अपशब्द’ लिखने को कहा। इतना ही नहीं, छात्र को यह कॉपी घर ले जाकर अभिभावकों के हस्ताक्षर करवाने का निर्देश भी दिया गया।
अनुशासन या अमर्यादा? सवालों के घेरे में सजा का तरीका
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की गलती सुधारने के लिए संवाद, परामर्श और सकारात्मक मार्गदर्शन जरूरी होता है। लेकिन यहां अपनाई गई सजा न केवल अमर्यादित है, बल्कि यह बाल मन पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाली भी मानी जा रही है। जिस शब्द के प्रयोग पर रोक लगाई जानी चाहिए, उसी को बार-बार लिखवाना क्या सुधार की दिशा है—यह सवाल अब चर्चा के केंद्र में है।
अभिभावकों का गुस्सा: “स्कूल संस्कार सिखाए या अपशब्द?”
घटना सामने आने के बाद छात्र के परिजन बेहद आक्रोशित हैं। पिता ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बच्चे गलती करते हैं, लेकिन उन्हें सुधारने के नाम पर इस तरह की सजा देना पूरी तरह अनुचित है। उनका कहना है कि जब बच्चा 200 बार वही अपशब्द लिखेगा, तो उसके मन में वही शब्द बार-बार दोहराया जाएगा, जो उसके व्यक्तित्व पर विपरीत असर डाल सकता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या स्कूलों में अब शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को गालियां लिखना भी सिखाया जाएगा? अभिभावकों ने इस मामले में जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
मामले ने पकड़ा तूल, संगठनों की चेतावनी
घटना के सामने आते ही यह मामला सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर तेजी से फैल गया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने इस कृत्य की कड़ी निंदा करते हुए शिक्षा विभाग से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन की ओर से स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन किया जाएगा।
शिक्षा विभाग हरकत में, जांच के आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए सरगुजा के जिला शिक्षा अधिकारी दिनेश झा ने संज्ञान लिया है। उन्होंने सहायक संचालक को जांच के लिए स्कूल भेजा है और स्पष्ट किया है कि प्रथम दृष्टया यह कृत्य अनुचित प्रतीत होता है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
बड़ा सवाल: क्या तय होगी जिम्मेदारी?
यह घटना केवल एक स्कूल या एक शिक्षक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र के सामने एक चुनौती है। निजी स्कूलों में अनुशासन के नाम पर किस हद तक जाने की छूट है, और बच्चों के अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित होगी—इन सवालों के जवाब अब जरूरी हो गए हैं।
अब नजर इस बात पर टिकी है कि जांच के बाद कार्रवाई कितनी प्रभावी होती है। क्या यह मामला भी नोटिस और चेतावनी तक सिमट जाएगा, या फिर ऐसा कदम उठाया जाएगा जो भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगा सके।
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