साजा में ‘कम्प्यूटर खरीदी’ पर बड़ा सवाल: चार गुना कीमत, बिना मांग सप्लाई और जवाबदेही से बचते नजर आए जिम्मेदार

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
बेमेतरा। साजा विधानसभा क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में कम्प्यूटर खरीदी को लेकर एक गंभीर वित्तीय अनियमितता उजागर हुई है, जिसने न सिर्फ प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं बल्कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को भी कठघरे में ला खड़ा किया है। लगभग एक करोड़ रुपये की लागत से वितरित किए गए 120 कम्प्यूटर सेट की खरीद बाजार मूल्य से करीब चार गुना अधिक दर पर किए जाने के आरोप सामने आए हैं। प्राथमिक जांच में ही करीब 70 लाख रुपये के संभावित अंतर की बात सामने आ रही है।
यह पूरी खरीदी विधायक निधि के तहत की गई बताई जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इस खर्च की उपयोगिता और मंशा—दोनों पर गंभीर संदेह पैदा करती है।
बिना मांग थमाए गए कम्प्यूटर, स्कूलों में बेकार पड़े सिस्टम
मैदानी पड़ताल में यह तथ्य उभरकर सामने आया कि जिन स्कूलों में कम्प्यूटर भेजे गए, वहां से इसकी कोई मांग ही नहीं की गई थी। नवागांवकला, केहका, केसतरा, बीजा सहित कई स्कूलों के प्राचार्यों ने स्पष्ट कहा कि उन्हें अचानक कम्प्यूटर मिल गए, जबकि न तो कोई पूर्व सूचना थी और न ही उपयोग को लेकर कोई दिशा-निर्देश।
स्थिति यह है कि अधिकांश स्कूलों में कम्प्यूटर रखने के लिए न तो लैब है और न सुरक्षित कक्ष। नतीजतन ये मशीनें स्टोर रूम, अलमारियों या कक्षों के कोनों में धूल खा रही हैं। विद्यार्थियों के लिए यह सुविधा फिलहाल “सजावटी वस्तु” बनकर रह गई है।
खरीदी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू खरीदी और आपूर्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता का पूरी तरह गायब होना है। स्कूलों को कम्प्यूटर सौंपते समय न तो सप्लायर फर्म का नाम बताया गया और न ही कोई संपर्क विवरण दिया गया। यहां तक कि कई जगहों पर कोई आधिकारिक पत्र या दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि यह सामग्री किस योजना के तहत और किस उद्देश्य से दी गई।
तकनीकी खराबी की स्थिति में किससे संपर्क किया जाए—इसका भी कोई स्पष्ट जवाब स्कूल प्रबंधन के पास नहीं है।
कीमतों का गणित: कागजों में ‘महंगे’, जमीन पर ‘पुराने’
प्राप्त जानकारी के अनुसार एक स्कूल को तीन कम्प्यूटर का एक सेट दिया गया, जिसकी कीमत ढाई लाख रुपये दर्शाई गई है। यानी एक कम्प्यूटर की लागत लगभग 83 हजार रुपये बैठती है। जबकि बाजार में इसी कॉन्फ़िगरेशन (i3 प्रोसेसर, 8GB RAM, Windows 10 Pro) के कम्प्यूटर काफी कम कीमत पर उपलब्ध हैं।
और भी हैरानी की बात यह है कि स्कूलों में पहुंचे कई कम्प्यूटर पुराने मॉडल के बताए जा रहे हैं, जिससे यह संदेह और गहरा जाता है कि कहीं कागजों में महंगे दिखाकर वास्तविकता में सस्ते या पुराने सिस्टम तो नहीं दिए गए।
फोटो खिंचवाकर वापस ले गए कम्प्यूटर!
डगनिया स्कूल से सामने आया एक मामला इस पूरी व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। यहां सप्लायर के लोग आए, जल्दबाजी में कम्प्यूटर इंस्टॉल किए, फोटो खिंचवाई और फिर एक सेट यह कहकर वापस ले गए कि इसकी जरूरत “विधायक कार्यालय” में है। यह घटना न केवल आपूर्ति प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है बल्कि संभावित हेरफेर की ओर भी संकेत करती है।
जिम्मेदारी से बचते नजर आए जनप्रतिनिधि
जब इस पूरे मामले पर साजा विधायक ईश्वर साहू से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने नाराजगी जाहिर करते हुए सीधे प्रशासनिक अधिकारियों—कलेक्टर और बीईओ—की ओर इशारा कर दिया। उनका कहना था कि उन्होंने केवल राशि स्वीकृत की थी।
हालांकि, इस बयान के बाद यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या जनप्रतिनिधि अपनी ही निधि के उपयोग और क्रियान्वयन से पूरी तरह अनभिज्ञ रह सकते हैं?
प्रशासन ने दिए जांच के संकेत
जिला कलेक्टर प्रतिष्ठा ममगाई ने मामले की जानकारी मिलने के बाद जांच टीम गठित करने और रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई का आश्वासन दिया है। वहीं, खंड शिक्षा अधिकारी डीजी पात्रा ने कहा कि यह खरीदी उनके कार्यकाल से पहले की है और वे जानकारी जुटाने के बाद ही कुछ कह पाएंगे।
बड़ा सवाल: लापरवाही या सुनियोजित गड़बड़ी?
पूरा मामला केवल लापरवाही तक सीमित नहीं लगता। बिना मांग आपूर्ति, चार गुना कीमत, दस्तावेजों का अभाव और संदिग्ध वितरण—ये सभी संकेत किसी बड़े वित्तीय खेल की ओर इशारा करते हैं।
अब देखना यह होगा कि जांच महज औपचारिकता बनकर रह जाती है या वास्तव में जिम्मेदारों तक पहुंचकर जवाबदेही तय की जाती है। फिलहाल, इस मामले ने सरकारी खर्च और निगरानी व्यवस्था दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
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