गुरु पूर्णिमा विशेष: बनोरा का अघोर गुरुपीठ—जहां ‘सेवा ही धर्म’ बनकर समाज को रोशन कर रहा है आध्यात्मिक प्रकाश

Journalist Amardeep Chauhan
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रायगढ़। आषाढ़ पूर्णिमा का दिन भारतीय परंपरा में केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ज्ञान, श्रद्धा और समर्पण का उत्सव है। गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर जहां एक ओर महर्षि वेदव्यास की जयंती मनाई जाती है, वहीं शिष्य अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर जीवन को दिशा देने वाले उस प्रकाश स्रोत को नमन करते हैं, जो अज्ञान के अंधकार को चीरकर मार्ग दिखाता है।
रायगढ़ जिले के बनोरा स्थित अघोर गुरुपीठ इन दिनों इसी आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना हुआ है। यहां पीठाधीश्वर प्रियदर्शी बाबा रामजी के सान्निध्य में अध्यात्म केवल उपदेश तक सीमित नहीं, बल्कि ‘सेवा’ के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का सशक्त माध्यम बन चुका है।
‘सेवा ही धर्म’—अघोर पंथ का मूल दर्शन
अघोर गुरुपीठ बनोरा में धर्म की परिभाषा कर्म से जुड़ती है। यहां निस्वार्थ सेवा को ही सच्चा धर्म माना जाता है। बाबा प्रियदर्शी रामजी के मार्गदर्शन में आश्रम की विभिन्न शाखाएं शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सहयोग के माध्यम से जरूरतमंदों तक पहुंच रही हैं। विशेष रूप से वे लोग, जो संसाधनों के अभाव में जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित हैं, उनके लिए यह पीठ सहारा बनकर उभरी है।
बाबा का स्पष्ट संदेश है—धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि पीड़ित मानव की सेवा से जीवन की वास्तविक सफलता तय होती है। यही विचार इस पीठ को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का केंद्र बनाता है।
आध्यात्मिकता और व्यवहारिक ज्ञान का संगम
बनोरा का यह गुरुपीठ एक ऐसी ‘आध्यात्मिक पाठशाला’ के रूप में विकसित हुआ है, जहां केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई जाती है। बाबा प्रियदर्शी रामजी का मानना है कि सुख-दुख मन की अवस्थाएं हैं और मनुष्य के भीतर अपार शक्तियां विद्यमान हैं, जिन्हें पहचानना और जागृत करना ही जीवन का असली लक्ष्य है।
वे शिष्यों को केवल ध्यान और साधना ही नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन में संतुलन, संयम और सेवा का महत्व भी समझाते हैं। यही कारण है कि यहां देशभर से विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए पहुंचते हैं।
समाज में बढ़ती दूरी को पाटने का प्रयास
आज के प्रतिस्पर्धी दौर में जहां रिश्तों में दूरी और समाज में वैमनस्यता बढ़ रही है, वहां बनोरा गुरुपीठ संवाद और समरसता का संदेश दे रहा है। बाबा के उपदेशों में सामाजिक एकता, प्रेम और सहअस्तित्व की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनके अनुयायी मानते हैं कि यह स्थान केवल साधना का केंद्र नहीं, बल्कि मानसिक शांति और सामाजिक संतुलन का आधार भी है।
भभूत का प्रतीक—विनम्रता और मुक्ति का संदेश
अघोर पंथ में भभूत का विशेष महत्व है। यह नश्वरता का प्रतीक होने के साथ-साथ विनम्रता और आत्मबोध का संदेश भी देती है। बाबा प्रियदर्शी रामजी भभूत को आध्यात्मिक विकास, भक्ति और मोक्ष का माध्यम मानते हैं। उनके अनुसार, जीवन की अस्थिरता को समझकर ही मनुष्य सच्चे मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
गुरु पूर्णिमा पर दिनभर धार्मिक आयोजन
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बनोरा गुरुपीठ में विविध धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। सुबह 7 बजे शक्तिपीठ ध्वज पूजन से शुरुआत होगी, इसके बाद गुरुचरण पादुका पूजन, हवन, सामूहिक आरती और गुरुगीता का पाठ होगा। प्रातः 9.15 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक गुरु दर्शन का अवसर रहेगा, जबकि दोपहर 12 बजे से शाम 4.15 बजे तक प्रसाद वितरण किया जाएगा। सायं 4.45 बजे सत्संग का आयोजन होगा, जिसमें श्रद्धालु बाबा के प्रवचनों का लाभ ले सकेंगे।
तीन दशक में बना आध्यात्मिक केंद्र
करीब तीन दशक पहले स्थापित यह गुरुपीठ आज ज्ञान, प्रेम और संस्कार की त्रिवेणी बन चुका है। यहां आने वाले श्रद्धालु न केवल आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान पाते हैं, बल्कि जीवन के उद्देश्य को समझने की दिशा भी प्राप्त करते हैं।
गुरु पूर्णिमा के इस अवसर पर बनोरा का अघोर गुरुपीठ एक बार फिर यह संदेश दे रहा है कि जब धर्म सेवा से जुड़ता है, तब वह समाज के लिए वास्तविक प्रकाश बन जाता है।
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