210 दिन का संघर्ष दिल्ली पहुँचा: जंतर-मंतर पर डटे छत्तीसगढ़ के डीएड अभ्यर्थी, नियुक्ति व जवाबदेही पर सरकार से सीधा टकराव

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायपुर/नई दिल्ली, 20 जुलाई 2026।
छत्तीसगढ़ में लंबे समय से लंबित डीएड अभ्यर्थियों की नियुक्ति का मुद्दा अब राज्य की सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया है। करीब सात महीने से अधिक समय—लगभग 210 दिनों—से जारी आंदोलन अब राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंच चुका है, जहां अभ्यर्थियों का प्रतिनिधिमंडल अपनी मांगों को लेकर डटा हुआ है।
राज्य के विभिन्न जिलों से पहुंचे अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने न्यायिक प्रक्रियाओं पर भरोसा करते हुए इंतजार किया, लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी। उनका आरोप है कि अदालतों के निर्देशों के बावजूद शिक्षा विभाग स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई, जिससे हजारों युवाओं का भविष्य अधर में लटक गया है।
संघर्ष का विस्तार: राज्य से राष्ट्र तक
दिल्ली के जंतर-मंतर पर बैठे अभ्यर्थियों ने अपने आंदोलन को केवल नियुक्ति तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे देश की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े व्यापक मुद्दों से भी जोड़ा है। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि यह आंदोलन अब “रोजगार और शिक्षा में जवाबदेही” की लड़ाई बन चुका है।
इस दौरान अभ्यर्थियों ने अन्य छात्र आंदोलनों के प्रति भी एकजुटता जताई। उन्होंने प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं से जुड़े विवादों और छात्रों पर पड़ रहे मानसिक दबाव को गंभीर चिंता का विषय बताया।
सरकार पर सीधा आरोप, इस्तीफे की मांग तेज
अभ्यर्थियों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और छत्तीसगढ़ के शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव की भूमिका पर सवाल उठाते हुए नैतिक जिम्मेदारी तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सरकार समयबद्ध तरीके से नियुक्तियां नहीं दे पा रही है, तो जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए।
हालांकि, सरकार या संबंधित विभाग की ओर से इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े कानूनी और तकनीकी पहलुओं की समीक्षा चल रही है।
मुख्य मांगें क्या हैं?
अभ्यर्थियों की प्रमुख मांगों में तत्काल नियुक्ति पत्र जारी करना, न्यायालय के आदेशों का पालन सुनिश्चित करना और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाना शामिल है। इसके साथ ही उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों और मंत्रियों की जवाबदेही तय करने की बात भी दोहराई है।
जंतर-मंतर पर आवाज: “यह सिर्फ नौकरी नहीं, भविष्य की लड़ाई”
प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों का कहना है कि यह केवल रोजगार पाने का सवाल नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ आवाज है जिसमें पढ़े-लिखे युवा वर्षों तक प्रतीक्षा करने को मजबूर हो जाते हैं।
एक प्रतिनिधि ने कहा, “हमने पढ़ाई की, परीक्षा दी, प्रक्रिया पूरी की—अब नियुक्ति के लिए सड़कों पर बैठना पड़ रहा है। यह केवल छत्तीसगढ़ की समस्या नहीं, देशभर के युवाओं की हकीकत बनती जा रही है।”
आगे क्या?
आंदोलन का अगला चरण क्या होगा, यह काफी हद तक सरकार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। फिलहाल, जंतर-मंतर पर डटे अभ्यर्थियों ने संकेत दिए हैं कि जब तक ठोस निर्णय नहीं होता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।
इस बीच, यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है—जहां एक ओर युवा अपने अधिकारों के लिए सड़क पर हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार पर समाधान निकालने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
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